नहीं रहीं महाश्‍वेता देवी...

नई दिल्ली (28 जुलाई): लंबे समय से बीमार चल रही प्रसिद्ध साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता महाश्‍वेता देवी का निधन हो गया है। ज्ञानपीठ, पद्म विभूषण और मैगसेसे पुरस्कारों से सम्मानित महाश्वेता देवी लंबे समय से उम्र संबंधी बीमारियों से ग्रस्त थी। वह करीब दो महीने से अस्पताल में भर्ती थी।

90 वर्षीया लेखिका पिछले दो माह से अस्ताल में थी और उन्हें जीवनरक्षक प्रणाली पर रखा गया था। साल 1996 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

महाश्‍वेता देवी का जन्‍म 14 जनवरी, 1926 को ढाका (अविभाजित भारत) में हुआ था। उनके माता-पिता भी साहित्‍यकार थे। पिता मनीष घटक कवि और उपन्‍यासकार थे और माता धारित्री देवी लेखन के साथ-साथ सामाजसेवा से भी गहराई से जुड़ी थीं। महाश्‍वेता देवी के जीवन और लेखन पर इन दोनों का ही बहुत प्रभाव पड़ा।

घर का माहौल पूरी तरह साहित्‍यमय था। इसी माहौल में उन्‍हें पलने-बढ़ने का अवसर मिला। बांग्‍ला के अलावा संस्‍कृत और हिंदी से इन्‍हें खासा लगाव था। भारत विभाजन के बाद महाश्‍वेता देवी का परिवार पश्चिम बंगाल में बस गया। महाश्‍वेताजी ने विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन में करीब 3 साल तक पढ़ाई की, जहां उन्‍हें गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से भी ज्ञान पाने का अवसर मिला।

बाद में कलकत्ता यूनिवर्सिटी से शिक्षा-दीक्षा पाई और यहां अंग्रेजी की लेक्‍चरर नियुक्‍त हुईं। इसके बाद लेखन कार्य को ज्‍यादा वक्‍त देने के लिए उन्‍होंने 1984 में रिटायरमेंट ले ली। महाश्‍वेता देवी का वैवाहिक जीवन बहुत ज्‍यादा स्‍थाई साबित नहीं हो सका। पति विजन भट्टाचार्य से 1962 में संबंध टूट गया। इसके बाद असीत गुप्त से दूसरा विवाह हुआ और यह रिश्‍ता भी 1975 में खत्‍म हो गया। इसके बाद उन्‍होंने पूरा जीवन लेखन और समाजसेवा के काम में लगा दिया।

महाश्‍वेता देवी की प्रमुख रचनाएं...

- लघुकथाएं: मीलू के लिए, मास्टर साब - कहानियां: स्वाहा, रिपोर्टर, वांटेड - उपन्यास: नटी, अग्निगर्भ, झांसी की रानी, हजार चौरासी की मां, मातृछवि, जली थी अग्निशिखा, जकड़न - आलेख: अमृत संचय, घहराती घटाएं, भारत में बंधुआ मजदूर, ग्राम बांग्ला, जंगल के दावेदार

उन्‍हें 1979 में ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, 1996 में ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ और 1997 में ‘रामन मैग्सेसे पुरस्कार’ मिला। अगर नागरिक सम्‍मान की बात की जाए, तो 1986 में ‘पद्मश्री’ और 2006 में उन्हें ‘पद्मविभूषण’ से नवाजा गया।