सावन स्पेशलः भगवान राम थे पहले कांवडिया

नई दिल्ली (25 जुलाई): हरिद्वार से गंगाजल लाकर अपने मंदिर में भगवान का जलाभिषेक करने की परंपरा बहुत पुरानी है। लेकिन यह परंपरा कब और कैसे शुरु हुई इसके बारे में य़अलग-अलग मत हैं। आइए, जानते हैं कि हरिद्वार से जल लाने की यात्रा यानी कांवड़ यात्रा की कुछ प्रचलित कहानियों के बारे में:  - ऐसा माना जाता है कि भगवान राम पहले कांवड़िया थे। 

- भगवान राम ने झारखंड के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल लाकर बाबाधाम के शिवलिंग का जलाभिषेक किया था।

- कुछ लोगों को मानना है कि पहली बार श्रवण कुमार ने त्रेता युग में कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी। 

- अपने दृष्टिहीन माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराते समय जब वह हिमाचल के ऊना में थे तब उनसे उनके माता-पिता ने हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा के बारे में बताया। 

- माता-पिता इस इच्छा को पूरा करने के लिए श्रवण कुमार ने उन्हें कांवड़ में बैठाया और हरिद्वार लाकर गंगा स्नान कराए। वहां से वह अपने साथ गंगाजल भी लाए। माना जाता है तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई।

- पुराणों के अनुसार इस यात्रा शुरुआत समुद्र मंथन के समय हुई थी। 

- मंथन से निकले विष को पीने की वजह से शिव जी का कंठ नीला पड़ गया था।  - विष के प्रभाव को दूर करने के लिए शिवभक्त रावण ने तप किया। इसके बाद रावण कांवड़ में जल भरकर लाया और पुरा महादेव में शिवजी का जलाभिषेक किया। 

- वइसके बाद शिव जी विष के प्रभाव से मुक्त हुए। कहते हैं तभी से कांवड़ यात्रा शुरू हुई।

- कुछ विद्वानों का मानना है कि सबसे पहले भगवान परशुराम ने कांवड़ से गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के बागपत के पास स्थित पुरा महादेव का जलाभिषेक किया था। 

- वह शिवलिंग का अभिषेक करने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाए थे।  

- आज भी लोग गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर पुरा महादेव का अभिषेक करते हैं। 

- यह भी माना जाता है कि समुद्र मंथन में विष के असर को कम करने के लिए शिवजी ठंडे चंद्रमा को अपने मस्तक पर सुशोभित किया था। फिर सभी देवताओं ने भोलेनाथ को गंगाजल चढ़ाया। तब से सावन में कांवड़ यात्रा शुरू हो गई।