कोहिनूर हीरे का कृष्ण काल से भी रहा है यह नाता

नई दिल्‍ली (20 अप्रैल): कोहिनूर के इतिहास की कहानी बहुत दिलचस्प है। कुछ लोग पुराणों में भी इसके जिक्र मिलने की बात करते हैं। पौराणिक कहानियों के मुताबिक कोहिनूर का पहला ज़िक्र 3 से 5 हज़ार साल पहले का मिलता है और ये प्राचीन संस्कृत इतिहास में 'स्यमंतक मणि' नाम से प्रसिद्ध था, जिसका नाता कृष्ण काल से बताया जाता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार स्यमंतक मणि ही बाद में कोहिनूर कहलाया। दूसरी मान्यता के मुताबिक ये मणि सूर्य से कर्ण को फिर अर्जुन और युधिष्ठिर को मिली। इसके बाद अशोक, हर्ष और चन्द्रगुप्त के हाथ ये मणि लगी। कहते है वैदिक युग में देव-दानव युद्ध में असुरों ने इन्द्र के सिंहासन से उखाड़कर इसे दक्षिण भारत में किसी जगल में गाड़ दिया था। जिसे बाद में माना गया कि वो आज के दौर के गोलकुंडा की एक खान थी।

एक और मान्यता 3200 ईसा पूर्व की है जिसके मुताबिक ये हीरा नदी की तली में एक मछुआरे को मिला था, जिसने स्थानीय साहूकार को करीब 20 रुपये में इसे बेच दिया था। प्राचीन काल में माना गया कि कोहिनूर का स्वामी संसार पर राज्य करने वाला बना, लेकिन जब से इस हीरे को अपनी पहचान मिली, तब से इसने सिर्फ तबाही ही मचाई है। ये भारत में तबाही और अस्थिरता ही लाया। मुस्लिम शासकों के लिए भी ये बर्बादी की वजह बना, लिहाज़ा इसे एक मनहूस हीरे के तौर पर ही देखा गया।

कोहीनूर के भारत में आखिरी मालिक महाराजा रणजीत सिंह ने मरने से पहले आखिरी अल्फ़ाज़ थे कि इस बेशकीमती हीरे को पुरी में भगवान जगन्नाथ के चरणों में अर्पित कर दिया जाए। हालांकि इस आखिरी वसीयत को लेकर लोगों में काफी शुब्हा था।

29 मार्च, 1849 लाहौर के क़िले पर ब्रिटिश हुकूमत का झंडा फहराया गया और बरतानिया हुकूमत के कब्ज़े के साथ ही पंजाब ब्रिटिश हुकूमत के अधीन आ गया। 'लाहौर सन्धि' में ये शर्त रखी गई कि महाराजा को ये बेशकीमती हीरा इंग्लैंड की महारानी को सौंपना होगा। कोहिनूर के गोलकुंडा की खान में मिलने और उसके बरतानिया हुकूमत के कब्ज़े में जाने तक कई लोगों ने उसपर मालिकाना हक़ जताया। मौजूदा दौर में कई देश इस बेशकीमती हीरे पर अपना दावा जता चुके हैं। हिंदुस्तान के साथ-साथ पाकिस्तान भी इस कोहीनूर पर अपना दावा पेश करता रहा है।

भारत और पाकिस्तान के अलावा अफ़ग़ानिस्तान और ईरान ने भी इस बेशकीमती हीरे पर अपना दावा पेश किया है। भारत की तरफ से कोहीनूर को वतन वापस लाने की आजादी के बाद कई कोशिशें हुई लेकिन नतीजा हरबार सिफर ही रहा।