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लोकसभा चुनाव 2019: प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश-बिहार तोड़ा जाति बंधन !

न्यूज़ 24-टुडे चाणक्य के एग्जिट पोल में उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों जगह एनडीए को जबर्दस्त कामयाबी मिलती दिख रही है। तो क्या मोदी ने जाति के बंधन को तोड़कर महागठबंधन के जातीय समीकरण को धराशाई कर दिया है

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (23 मई): लोकसभा चुनाव अपने अंतिम पड़ाव पर है। सातों चरणों की वोटिंग के बाद अब से थोड़ी देर बाद वोटों की गिनती शुरू होने वाली है। इस काउंटिंग पर देश-दुनिया की नजर है। 7वें और अंतिम चरण का मतदान समाप्त होने के बाद रविवार 19 मई को आए एक्जिट पोल में से ज्यादातर का आकलन है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फिर से सत्ता में लौटेंगे। कुछ पोल के मुताबिक एनडीए को आसान बहुमत मिलेगा जबकि कुछ अन्य बहुमत के आंकड़े 272 से बहुत अधिक 300 से ज्यादा सीटें मिलने की बात कर रहे हैं। न्यूज़ 24-टुडे चाणक्य के एग्जिट पोल में उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों जगह एनडीए को जबर्दस्त कामयाबी मिलती दिख रही है। तो क्या मोदी ने जाति के बंधन को तोड़कर महागठबंधन के जातीय समीकरण को धराशाई कर दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश और बिहार में सालों से चला आ रहा जाति का बंधन टूट गया है? क्या मोदी के विकास और राष्ट्रवाद का मुद्दा इस बार कास्ट पॉलिटिक्स पर भारी पड़ा है ? 

प्रधानमंत्री मोदी ने कुंभ मेले के दौरान सफाई कर्मियों के पैर धोकर दलित बिरादरी के सम्मान की जो मिसाल कायम की और अब उसका असर अब सामने आया है। पीएम मोदी ने उस दौरान कहा कि था कि 'हर व्यक्ति के जीवन में अनेक ऐसे पल आते हैं, जो अविस्मरणीय होते हैं। आज ऐसा ही एक पल मेरे जीवन में आया है, जिन स्वच्छाग्रहियों के पैर मैंने धोए हैं, वह पल जीवनभर मेरे साथ रहेगा।' पीएम मोदी ने दलितों के पैर पखारकर न सिर्फ विरोधियों को चित कर दिया बल्कि एक झटके में दलितों का दिल जीतकर उत्तर प्रदेश के जातीय गणित को भी तोड़ दिया। न्यूज़ 24-टुडेज़ चाणक्य का एग्जिट पोल तो यही कह रहा है कि मोदी के मैजिक के आगे उत्तर प्रदेश और बिहार में महागठबंधन का जातीय समीकरण बुरी तरह ध्वस्त हो गया है। यानी न तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और मायावती का यादव-दलित गठजोड़ काम आया और न ही बिहार में आरजेडी का मुस्लिम यादव समीकरण।

न्यूज़ 24-टुडेज़ चाणक्य एग्जिट पोल (उत्तर प्रदेश)

बीजेपी – 65 (+/- 8) 

महागठबंधन – 13 (+/- 6) 

कांग्रेस – 2 (+/- 2) 

अन्य – 0 

 यूपी में खिला कमल ! इसका मतलब ये है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बीएसपी और आरएलडी के साथ आने के बावजूद मुस्लिम, यादव, दलित और जाट वोट उन्हें एकमुश्त नहीं मिल पाया। जबकि इसी फॉर्मूले पर महागठबंधन ने पिछले साल हुए उपचुनाव में गोरखपुर, फूलपुर और कैराना की सीट पर जीत दर्ज की थी। सवाल है कि इस बार ये फॉर्मूला काम क्यों नहीं आया। आपको याद दिला दें कि 2014 के चुनाव में भी एनडीए ने उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए विपक्ष का करीब करीब सफाया कर दिया था। 

2014 के नतीजे 

बीजेपी – 71 

अपना दल – 2 

एसपी – 5 

कांग्रेस – 2 

बीएसपी - 0लेकिन पिछले चुनाव में एसपी और बीएसपी ने अलग अलग चुनाव लड़ा था जबकि इस बार दोनों पार्टियां एक साथ चुनाव मैदान में थी इसलिए अनुमान लगाया जा रहा था महागठबंधन इस बार यूपी में 50 से भी ज्यादा सीटें बटोर सकता है। न्यूज़ 24-टुडेज़ चाणक्य के एग्जिट पोल के मुताबिक कमोबेश पिछली तस्वीर ही बनती दिख रही है। इसकी वजह समझने से पहले उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरण पर एक नजर डालना जरूरी है।उत्तर प्रदेश का जातीय समीकरण 

ओबीसी - 40 फीसदी 

यादव - 8% 

लोधी - 7% 

कुर्मी - 3% 

कुशवाहा - 14% 

अन्य ओबीसी- 8% 

उत्तर प्रदेश का जातीय समीकरण 

दलित - 21 फीसदी 

जाटव दलित - 9% 

गैर जाटव दलित - 11% 

हालांकि 2014 के चुनाव में बीजेपी को यादवों समेत तमाम पिछड़ी जातियों के भी अच्छे खासे वोट मिले थे। बावजूद इसके इस बार ज्यादा यादव मतदाता महागठबंधन के साथ ही बताए जा रहे थे। पर एग्जिट पोल के नतीजे को आधार मानें तो ऐसा लगता है कि इस बार लोधी, कुर्मी, कुशवाहा और अन्य पिछली जातियों ने बीजेपी को एकमुश्त वोट दिया है जिसके आगे महागठबंधन का जातीय समीकरण फीका पड़ गया। महागठबंधन ने इस बार यूपी में इसलिए भी उम्मीद ज्यादा लगा रखी थी क्योंकि बीएसपी के साथ होने से दलित वोट पर भी दावेदारी थी पर एग्जिट पोल के नतीजों से लगता है कि समाजवादी पार्टी और बीएसपी एक दूसरे को अपना वोट ट्रांसफर करवाने में नाकाम रहे हैं । गैर जाटव दलितों में वाल्मिकी, धोबी, खटीक, कोल, गोड़ और खरवार जातियां शामिल हैं। 2014 के चुनाव में भी इन वोटों में बिखराव हुआ था और इस बार भी एग्जिट पोल के नतीजों से जाहिर है कि गैर जाटव दलितों ने महागठबंधन की बजाए बीजेपी के पक्ष में मतदान किया है।अब बात बिहार की। करीब तीन दशकों तक बिहार और देश की राजनीति पर छाये रहे लालू प्रसाद यादव का माई समीकरण इस बार छिन्न भिन्न होता दिख रहा है। मुस्लिम यादव गठजोड़ के सहारे विरोधियों को चित करने वाले आरजेडी के महागठबंधन को इस बार बिहार में जबर्दस्त झटका लग सकता है। 

न्यूज़ 24-टुडेज़ चाणक्य एग्जिट पोल लोकसभा सीटें - 40 

एनडीए - 32 (+/-4) 

महागठबंधन – 8 (+/-4)बिहार में इस बार आरजेडी ने कांग्रेस, हम, आरएलएसपी और वीआईपी जैसी पार्टियों के साथ महागठबंधन बनाकर बीजेपी और जेडीयू की संयुक्त ताकत को चुनौती दी थी। भरोसा था कि मुस्लिम यादव वोट बैंक के साथ गठबंधन को दलित, मल्लाह और कुशवाहा वोट का भी फायदा होगा। पर एग्जिट पोल के नतीजे महागठबंधन की उम्मीदों के खिलाफ जा रहे हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी पिछली बार एनडीए ने जबर्दस्त कामयाबी हासिल की थी।     

2014 के नतीजे 

एनडीए – 31

 कांग्रेस – 2 

एनसीपी – 1 

जेडीयू – 2 

आरजेडी – 4 

एनडीए को ये कामयाबी तब मिली थी जब उसने जेडीयू के बगैर ही चुनाव लड़ा था। हालांकि तब कुशवाहा और जीतन राम मांझी जैसे नेता उसके साथ थे, जो इस बार आरजेडी और कांग्रेस गठबंधन के साथ हैं। बावजूद इसके अगर महागठबंधन इस लड़ाई में पिछड़ता दिख रहा है तो इसकी वजह साफ है कि उसका माई समीकरण नहीं चला और दलितों-पिछड़ों ने भी साथ नहीं दिया।

बिहार का जातीय समीकरण 

ओबीसी 51 फीसदी 

यादव - 14.4% 

कुशवाहा - 6.4% 

कुर्मी - 4% 

मुस्लिम - 16.9%   

सवर्ण - 17% 

इनमें से मुस्लिम यादव वोट पर आरजेडी का दबदबा रहा है जबकि कुर्मी-कोइरी वोट पर जेडीयू का और सवर्ण वोटों पर बीजेपी की पकड़ मजबूत मानी जाती है। हालांकि 2014 के मोदी लहर में एनडीए को पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों का भी खासा वोट मिला था। पर उसके बाद विधानसभा चुनाव में आरजेडी ने जेडीयू के साथ मिलकर अपनी खोई ताकत फिर से हासिल कर ली थी। इस बार भी नये जातीय समीकरण के साथ महागठबंधन बड़ी जीत की हसरत पाले हुए है पर एग्जिट पोल की मानें तो पिछली बार की तुलना में इस बार के चुनावी रिजल्ट पर कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला। दरअसल लालू यादव की गैरमौजूदगी में पहली बार चुनाव का सामना कर रहा आरजेडी इस बार अपने जातीय समीकरण को बचा पाने में नाकाम दिख रहा है। जबकि दूसरी तरफ एनडीए नीतीश कुमार और राम विलास पासवान के जरिये सवर्ण वोटों के साथ साथ पिछड़ी जातियों और महादलितों के वोट भी अपने पाले में करने में कामयाब होता दिख रहा है। इसके अलावा पसमांदा मुसलमानों के लिए आरक्षण का बंदोबस्त करके भी नीतीश कुमार ने माई समीकरण में बड़ी सेंध लगाई है। लेकिन सिर्फ जातीय गणित ही इस संभावित नतीजे की वजह नहीं है। अलबत्ता अगर गौर से देखें तो उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी इस बार जातीय समीकरण टूटता दिख रहा है। इसके पीछे दो बड़े चेहरे हैं। पहला चेहरा नीतीश का है जिन्होंने विकास के नाम पर कास्ट पॉलिटिक्स को काफी हद तक पीछे धकलने में कामयाबी हासिल की है और दूसरा चेहरा पीएम मोदी का जो राष्ट्रवाद के जरिये अगड़ी-पिछड़ी जातियों को साथ लाने में सफल होते दिख रहे हैं। 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में लालू यादव ने आरक्षण का मुद्दा उठाकर बीजेपी को बैकफुट पर धकेल दिया था। लिहाजा इस बार भी तेजस्वी यादव ने आरक्षण कार्ड खेलकर पिछड़ी जातियों को गोलबंद करने की कोशिश की। पर एग्जिट पोल के नतीजे तो यही बताते हैं कि मतदाताओं ने जातीय गोलबंदी को ठुकराकर नीतीश के विकास और मोदी के राष्ट्रवाद को चुना है।

यानी एक तरफ जहां मोदी ने राष्ट्रवाद की राजनीति के जरिये सवर्ण मतदाताओं और पिछड़ों का गोलबंद किया। तो दूसरी ओर उज्जवला योजना और हर घर शौचालय अभियान के जरिये अति पिछड़ों और दलितों का भरोसा जीता। इसके अलावा कुंभ मेले के आयोजन को शानदार बनाकर उन 22 करोड़ लोगों को भी गहरे प्रभावित किया जो कुंभ स्नान के लिए प्रयागराज आए थे। मतलब धर्म, राष्ट्र और विकास को एक साथ जोड़कर मोदी ने महागठबंधन के जातीय समीकरण को मात दे दी। हालांकि एग्जिट पोल के नतीजे अंतिम नतीजे नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार की जनता का पूरा मिजाज 23 मई को मतगणना के बाद ही साफ हो पाएगा। पर अगर एग्जिट पोल में दिख रहा ट्रेंड सही साबित होता है तो ये तय है कि सालों से जात-पात की सियासत में बंधे उत्तर प्रदेश में मोदी ने जाति के बंधन को तोड़कर नया इतिहास रच दिया है। 

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