अबकी बार अनुच्छेद 370 पर वार !

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प्रभाकर मिश्रा, न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (30 मई): लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साक्षात्कार में जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 35ए और अनुच्छेद 370 का समर्थन करने वालों के लिए कहा था कि वे भारतीय नागरिकता के लायक नहीं हैं। उनको चुनाव लड़ने का हक नहीं है। प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर की आर्थिक बदहाली के लिए भी इन दोनों अनुच्छेदों को जिम्मेदार बताया था। प्रधानमंत्री के उस बयान के जवाब में पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने अपने ट्वीटर पर लिखा था ‘न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी। न तो बीजेपी दोबारा चुनी जाएगी और न ही वो धारा 370 को खत्म कर पाएंगे।’ लोकसभा चुनाव में मिली प्रचंड बहुमत के बाद महबूबा मुफ्ती की भाषा में कहा जाए तो 'नौ मन तेल' हो गया है ऐसे में अब सवाल ये कि क्या अब 'राधा नाचेगी' यानी क्या मोदी सरकार जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने वाले अनुच्छेद 35ए और अनुच्छेद 370 को हटाएगी? अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार मिले हुए हैं। अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के अनुसार, रक्षा, विदेश नीति और संचार मामलों को छोड़कर किसी अन्य मामले से जुड़ा क़ानून बनाने और लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार की अनुमति चाहिए होती है। इसी विशेष दर्जें के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान का अनुच्छेद 356  जिसके कारण भारत के राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बरख़ास्त करने का अधिकार नहीं है। यही नहीं, संविधान का अनुच्छेद 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता।अनुच्छेद 35ए राज्य की विधानसभा को 'स्थायी निवासी' की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है। यहअनुच्छेद 370 का हिस्सा है जिसके मुताबिक जम्मू-कश्मीर में भारत के किसी अन्य राज्य का निवासी जमीन या किसी भी तरह की प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकता।

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की घोषणा पत्र में अनुच्छेद 370 को हटाने की बात की गई थी। इस बार भी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में अनुच्छेद 370 को प्रमुखता से स्थान दिया था। प्रधानमंत्री मोदी सहित पार्टी के तमाम बड़े नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान यह वादा किया किया था कि अगर सरकार बहुमत में आती है तो जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाली इस व्यवस्था को ख़त्म किया जाएगा। 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने से पहले लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि अनुच्छेद 370 पर देश भर में बहस होनी चाहिए। प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित होने के बाद मोदी ने कहा था कि ‘संविधान के अनुसार इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि अनुच्छेद 370 समाप्त हो या जारी रहे, कम से कम इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि अनुच्छेद 370 से जम्मू कश्मीर को फायदा हुआ है या नहीं।’ हालांकि  नरेंद्र मोदी का यह बयान बीजेपी के उस रूख के खिलाफ था जिसमें भारत में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने वाले अनुच्छेद को पूर्ण रूप से रद्द करने की मांग की जाती रही है। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में पांच साल कुर्सी संभालने के बाद नरेंद्र मोदी खुद यह मान चुके हैं कि जम्मू-कश्मीर की आर्थिक बदहाली के लिए अनुच्छेद 35ए और अनुच्छेद भी 370 जिम्मेदार हैं।  लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने एक नहीं, अपने कई चुनावी सभाओं कहा था कि, अगर नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री चुने जाते हैं तो कश्मीर को विशेष शक्तियां देने वाले अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया जाएगा। गृह मंत्री के रुप में राजनाथ सिंह ने भी जयपुर की एक जनसभा में इस बात पर बल दिया था कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 व 35 ए के लाभ की समीक्षा करने का समय आ गया है।

जनसभा के बाद पत्रकारों से हुई बातचीत में राजनाथ सिंह ने कहा था कि अनुच्छेद 370 संविधान की एक अस्थायी व्यवस्था है। अब इस बात की समीक्षा करने का समय आ गया है कि इस व्यवस्था से जम्मू-कश्मीर को कितना लाभ हुआ है। उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया था कि 'अब कुछ लोग भारत में दो प्रधानमंत्री होने की बात कर रहे हैं तो अनुच्छेद 370 व 35ए का क्या औचित्य रह जाता है?' आपको याद होगा कि जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने एक अपने एक बयान में कहा था कि 'हम अपने राज्य के लिये सदर-ए-रियासत और प्रधानमंत्री पद फिर से हासिल करने के लिये प्रयास करेंगे।' इस बार लोकसभा चुनाव में मिली प्रचंड बहुमत के बाद जम्मू कश्मीर के प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष रविंदर रैना ने उनकी पार्टी का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि उनकी पार्टी संविधान के अनुच्छेद 35ए और अनुच्छेद 370 को जल्दी हटाने के पक्ष में है। उन्होंने ये भी कहा कि 'अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर के लोगों के साथ सबसे बड़ा अन्याय है, यह एक अस्थायी संक्रमणकालीन प्रावधान है जबकि 35ए सबसे बड़ी संवैधानिक गलती है जिसे संसद की सहमति के बगैर पिछले दरवाजे से जोड़ा गया था। हम उम्मीद करते हैं कि इन दोनों संवैधानिक प्रावधानों को जल्दी हटाया जाएगा।’ कश्मीर के प्रति भाजपा के नेताओं का रुख इस बात को खुद ब खुद साफ कर देता है कि आने वाले वक़्त में अनुच्छेद 370 और 35 ए को लेकर बड़ा फैसला कर सकती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास मौका है कि वे पार्टी के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पार्टी के आदर्श पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के सपने को पूरा कर सकते हैं। स्वर्गीय श्यामाप्रसाद मुखर्जी एक देश में दो विधान के खिलाफ थे, अनुच्छेद 370 के खिलाफ उन्होंने अपनी जान दे दी थी। अटलजी को कश्मीर से बहुत लगाव था। अटलजी कश्मीर को भारत का मुकुट कहते थे। उनका भी मानना था कि अनुच्छेद 370 ने कश्मीर को शेष भारत से पृथक कर दिया है। 22 अप्रैल 1962 को राज्यसभा में दिये अपने भाषण में अटल जी ने कहा था - "संविधान का अनुच्छेद 370 ख़त्म होने चाहिए। यह एक अस्थायी प्रावधान है लेकिन किन्तु अब घड़ी की सुई को उल्टा घूमने की कोशिश की जा रही है। काल के प्रवाह को पलटने का प्रयत्न हो रहा है। शेख अब्दुल्ला बड़े व्यक्ति हो सकते हैं, मैं उनका सम्मान करता हूँ, किन्तु वे जम्मू - कश्मीर और शेष भारत से बड़े नहीं हो सकते।" आज अटलजी होते तो फारुख अब्दुल्ला की जगह उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के लिए यही बात कहते! अटलजी अपने पूरे कार्यकाल के दौरान इस बात पर अफ़सोस करते रहे कि बहुमत न होने के कारण धारा 370 पर कोई फ़ैसला नहीं ले पा रहे हैं। इस चुनाव में मिले प्रचंड बहुमत के बाद प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को ऐसा फैसला लेने में कोई अड़चन नहीं आएगी।

चुनाव के दौरान जम्मू-कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने अनुच्छेद 370 और 35ए को लेकर खूब बयानबाजी की। पीडीपी मुखिया महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए हटाया गया तो कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं रहेगा। उन्होंने धमकी दी कि इन धाराओं के साथ छेड़छाड़ किया गया तो तिरंगा को कांधा देने के लिए कोई नहीं मिलेगा। इसी मुद्दे पर पीडीपी का समर्थन करते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने कहा था कि कश्मीर में अलग वज़ीर-ए-आजम होना चाहिए। ऐसे में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले इन प्रावधानों से छेड़छाड़ किया गया तो राज्य में बवाल हो सकता है। हालांकि जम्मू कश्मीर में अशांति की स्थिति तो अक्सर बनी ही रहती है! पिछले 27- 28 सालों से आये दिन कोई न कोई विरोध प्रदर्शन तो होता ही रहता है। ऐसे में सरकार यह रिस्क भी उठा सकती है। जैसे 8 अगस्त 1953 को तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला को कथित तौर पर कश्मीर को भारत से अलग करने की साज़िश रचने के आरोप में डिसमिस करके जेल में डाल देने पर विरोध ज़रूर हुआ था परंतु वह धीरे-धीरे शांत हो गया। ठीक उसी तरह धारा 370 ख़त्म करने पर विरोध होगा, लेकिन धीरे-धीरे शांत हो जाएगा और जम्मू कश्मीर से अलगाववाद और आतंकवाद की समस्या का जड़ से नाश हो जाएगा और अगर प्रधानमंत्री के रुप में नरेंद्र मोदी ने यह काम कर दिया तो उनका नाम देश के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो जाएगा।