वेबसाइट्स में एड-ब्लॉक सॉफ्टवेयर वैधानिक रूप से कितना जायज़

 

 

अंकित चतुर्वेदी, नई दिल्ली (9 मार्च) : वेबसाइट्स में एड-ब्लॉक सॉफ्टवेयर की वैधानिकता पर विचार करने से पहले इसकी पृष्ठभूमि को जानना ज़रूरी है।

विस्तृत प्रष्ठभूमि

जर्मनी के हैम्बर्ग डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के Eyeo GmbH मामले में दिए फैसले ने इंटरनेट मीडिया में काफी हलचल पैदा कर दी। Eyeo GmbH जर्मनी आधारित एक स्टार्ट-अप फर्म है, जिसने 'एडब्लॉक प्लस' सॉफ्टवेयर विकसित किया। इस सॉफ्टवेयर ने पिछले सालों में लगातार काफी लोकप्रियता बटोरी है। जिसका इस्तेमाल वेबसाइट्स पर ऐसे विज्ञापनों को ब्लॉक करने के लिए होता है, जिन्हें इंटरनेट यूज़र्स ‘दखलंदाज’ और ‘खीझ पैदा करने वाला’ मानते हैं।

एडब्लॉक प्लस एक ओपन-सोर्स कन्टेंट-फिल्टरिंग और एडवरटाइजमेंट ब्लॉकिंग एक्सटेंशन है,  जिसे Eyeo GmbH ने विकसित किया है। एडब्लॉक प्लस, होस्ट वेबसाइट से बिना लाइसेंस के असावधानी के साथ वेबसाइट के कुछ कंटेंट को ब्लॉक कर देता है। जिससे वेबसाइट में ऐसे बदलाव होते हैं, जिनकी मंजूरी भी नहीं होती। साथ ही यह मालिक (ओनर) के वेबसाइट पर कॉपीराइट के अधिकार का भी उल्लंघन करता है। जिससे असली कंटेंट के अमौलिक रचना/रूपान्तरण तैयार किया जा सकता है। वैसे इस तरह के कई कंटेंट-फिल्टरिंग सॉफ्टवेयर मौजूद हैं। जिनके नामों में प्राइवॉक्सी, एडफेंडर आदि शामिल हैं। इन एड-ब्लॉकिंग सॉफ्टवेयर्स के फीचर्स ज्यादातर समान ही हैं। इन सॉफ्टवेयर्स की वैधता का परीक्षण करने में कई ऐसे सवाल शामिल हैं। हालांकि, इस मकसद के लिए हम इस लेख में एडब्लॉक प्लस सॉफ्टवेयर का उल्लेख करेंगे। क्योंकि यह सबसे आम कन्टेंट ब्लॉकिंग सॉफ्टवेयर है।

कन्टेंट-फिल्टरिंग सॉफ्टवेयर का विवादों से सामना होने का यह पहला मौका नहीं है। जर्मनी के इस मामले के इस साल की शुरुआत में सामने आने से पहले साल 2007 में एड-ब्लॉक विवाद की जडें अमेरिका की एक वेबसाइट से मिलती हैं। यह वेबसाइट थी- www.jacklewis.net । इस मामले में ओनर ने जानबूझकर अपनी वेबसाइट के एक्सेस को उन फायरफॉक्स यूजर्स के लिए ब्लॉक कर दिया था। जिन्होंने एडवरटाइज़मेंट ब्लॉकिंग सॉफ्टवेयर को उनके कम्प्यूटर्स में इन्सटॉल किया था।

इसके नतीजे में www.whyisfirefoxblocked.com वेबसाइट बनाई गई। जिसमें ओनर के ऐसा करने के पीछे वजहों का हवाला दिया।

दर्शकों का विज्ञापनों को ब्लॉक या उनको अनदेखा करने का यह अभ्यास कोई नई घटना नहीं है। यह लोगों के घरों में टेलीविजन के माध्यम से मनोरंजन के पहुंचने के शुरुआती समय से ही चालू है। लोगों के जानबूझकर टेलीविजन विज्ञापनों को अनदेखा करने को 'कमर्शियल स्किपिंग' कहा जाता है।

कमर्शियल स्किपिंग की वैधता

जहां तक कमर्शियल स्किपिंग का सवाल है, भारत में कोई भी ऐसा मुकदमा सामने नहीं आया है। जबकि, अमेरिका की अदालतें एडवरटाइज़र्स और उन लोगों के बीच एक खेल का मैदान बनी रहती हैं। जो कि ऐसी टेक्नॉलॉजी विकसित करने के व्यापार में लगे हुए हैं, जो दर्शकों को विज्ञापनों को टाल देने की ताकत देते हैं। ऐसा पहला मामला जो अमेरिका में सामने आया, वह था- सोनी बनाम यूनिवर्सल स्टूडियोज़ आईएनसी। इस मामले में, सोनी विडियो कैसेट रिकॉर्डर (वीसीआर) नाम की एक टेक्नॉलॉजी लेकर आई। वीसीआर ने यूजर्स को एक विकल्प उपलब्ध कराया। जिससे टेलीविजन प्रोग्राम को रिकॉर्ड किया जा सके और प्लेबैक के दौरान विज्ञापनों को छोड़ दिया जाए।

टेलीविजन और मूवी स्टूडियोज़ ने दलील देने की कोशिश की कि सोनी को विडियो कैसेट रिकॉर्डर्स बनाने के लिए कॉपीराइट उल्लंघन के लिए अंशदायी उत्तरदायी (कॉन्ट्रीब्यूट्री लायबल) ठहराया जाए। जिसकी वजह से खुद ही यूजर्स को टेलीविजन प्रोग्राम्स को रिकॉर्ड करने की सुविधा मिल रही है। यह उन्हें प्लेबैक के दौरान कमर्शियल्स को छोड़ देने की छूट देता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। साथ ही कहा, सोनी को वीसीआर के एक फंक्शन के चलते 'कॉन्ट्रीब्यूट्री लायबल' नहीं ठहराया जा सकता। यह कंपनी के वैधानिक, गैर-उल्लंघनकारी मकसद की तुलना में गौण (सेंकेंड्री) है। जबकि, असली मकसद तो टाइम-शिफ्टिंग और एक टेलीविजन प्रोग्राम को रिकॉर्ड करना है। जिससे बाद में किसी और दिन इसे देखा जा सके।

हालांकि, यह मामला वीसीआर के समय का है। लेकिन टेक्नॉलॉजी में आए बदलाव के बाद भी डिजिटल युग में भी समान समस्या सामने आई है। इस बार जो तकनीक सवालों के घेरे में है वह है- डिजिटल विडियो रिकॉर्डर। इस बार जिन दो कंपनियों को एडवरटाइज़र्स की नाराजगी का सामना करना पड़ा है वे हैं- TiVo Inc और ReplayTV Inc।

रिप्लेटीवी ने अपने डीवीआर में ‘कमर्शियल एडवांस’ नाम का एक फीचर शामिल करने की योजना बनाई थी। जिससे दर्शकों को अपने आप ही विज्ञापनों को स्किप करने की सुविधा मिलेगी। यह फीचर ही कारण था जिसकी वजह से रिप्लेटीवी के खिलाफ मुकदमा किया गया। यह मुकदमा मीडिया कंपनियों की तरफ से किया गया, जिन्होंने कमर्शियल स्किपिंग की वैधता को चुनौती देने की मांग की थी। गौरतलब है, रिप्लेटीवी की कमर्शियल एडवांस टेक्नॉलॉजी का यह खास फीचर डीवीआर को रिकॉर्डिंग के वक्त अपने आप ही विज्ञापनों को डिलीट कर देता था। जिससे प्लेबैक के दौरान दर्शक कमर्शियल ब्रेक के दौरान एक भी विज्ञापन ना देखे।

सोनी मामले में कोर्ट ने माना कि कि यूजर्स प्लेबैक के दौरान कमर्शियल्स को फास्ट फॉरवर्ड करके देख सकते हैं। साथ ही ऐसा विकल्प रखना गैरकानूनी नहीं है। क्योंकि यह प्रोग्राम के कॉपीराइट का उल्लंघन नहीं करता, क्योंकि यह ब्रॉडकास्ट हो चुका है। रिप्लेटीवी के खिलाफ दलील सोनी कोर्ट आधार पर एक राय थी- कि कमर्शियल्स को सिस्टम के साथ फास्ट-फॉरवर्ड करना 'बेहद लंबी और उबाऊ' प्रक्रिया है। यह सही मायनों में एक खतरा पैदा करती हैं। यहां, वादी पक्ष ने दलील दी कि 'कमर्शियल एडवांस फीचर',  कमर्शियल स्किपिंग को बेहद आसान बनाएगा। इसलिए इसे ‘उल्लंघनकारी गतिविधि’ के तौर पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने आगे तर्क दिया कि रिप्लेटीवी के फीचर्स, स्वतंत्र-टेलीविजन और आधारभूत गैर-ब्रॉडकास्ट सेवाओं के ‘मौलिक वित्तीय आधार’ पर भी हमला करते हैं। एडवरटाइजर्स टेलीविजन प्रोग्रामिंग के दौरान दर्शकों तक पहुंचने के लिए भुगतान ही नहीं करेंगे, अगर विज्ञापन उनके सामने अदृश्य हो जाएंगे।

हालांकि, रिप्लेटीवी, आईएनसी का मामला आखिरकार कोर्ट ने सुलझा दिया। नतीजा ये रहा कि इस याचिका की मांग पर रिप्लेटीवी 'कमर्शियल एडवांस फीचर' को हटाने के लिए तैयार हो गया। टाइवो ने भी एक उत्पाद बनाया, जिसमें कई फीचर्स रिप्लेटीवी की तरह ही थे। टाइवो एडवरटाइजर्स के साथ उन तरीकों के बारे में अध्ययन करने के लिए तैयार होने से औपचारिक याचिका से बच गया। जिनसे इसके यूजर्स ने डीवीआर में शामिल फीचर का 'कमर्शियल स्किपिंग' में इस्तेमाल किया।

इन मामलों के विश्लेषण से एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि एडवरटाइजर्स को तब समस्या नहीं है, जबकि दर्शक अपनी इच्छा से विज्ञापनों को अनदेखा करते हैं। यहां तक कि हम सभी अपने घरों में हमेशा ही ऐसा करते हैं। हममे से कई पूरे ध्यान से एड-ब्रेक्स के दौरान क्या करना है, इसपर, अपनी गतिविधियों की योजना बनाते हैं, जब भी हमारा मनपसंद शो ऑन-एयर होता है। ऐसे में दरअसल एडवरटाइजर्स के सामने दिक्कत कहां है? एडवरटाइजर्स के साथ समस्या एक ऐसी तकनीक की उपलब्धता की कमी है। जो कि दर्शकों के पास पूरी तरह अलग से विज्ञापनों को देखने के लिए ही उपलब्ध हो।

एक वेबसाइट का कॉपीराइट उल्लंघन

जैसे कि इंटरनेट अब ज्यादातर लोगों के लिए मनोरंजन और सूचनाओं का एक अहम साधन बन चुका है। ऐसे में एडवरटाइजर्स का इंटरनेट पर इकट्ठा होना तय है। जिससे वे अपने उत्पादों और सेवाओं का विज्ञापन कर सकें। साइबर स्पेस में समस्या शुरू होती है एक टेक्नॉलॉजी की उपलब्धता से, जो कि विज्ञापनों को वेब-ब्रॉउसिंग एक्सपीरियंस से बिल्कुल अलग कर देती हैं। एड-ब्लॉकिंग सॉफ्टवेयर्स की उपलब्धता जो इंटरनेट यूजर्स को विज्ञापनों को पूरी तरह से अलग करने का आवश्यक टूल देता है। इसे अक्सर वेबमास्टर के कॉपीराइट उल्लंघन की तरह देखा जाता है।

यही जर्मनी में Eyeo के खिलाफ हुए मामले का आधार था। इसके अलावा जर्मनी के कम्पटीशन लॉ के तहत कुछ दावों का भी। जर्मनी का मामला इस मुद्दे को रौशनी में लाता है। मुद्दा है- ‘इंटरनेट युग में कमर्शियल स्किपिंग का महत्व’। यह एक दिलचस्प बहस भी तैयार करता है कि इसे भारतीय कॉपीराइट एक्ट, 1957 के तहत किस तरह लिया जाएगा?

लेकिन भारतीय व्यवस्था में जाने से पहले इसपर नज़र डालते हैं कि ‘कमर्शियल स्किपिंग’ को अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों के कॉपीराइट व्यवस्था में किस तरह देखा जाता है?

पेजफेयर और एडोब की तरफ से प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, एड-ब्लॉकिंग सॉफ्टवेयर का दुनिया भर में इस्तेमाल करने वाले सक्रिय उपभोक्ताओं की संख्या साल-दर-साल 41 फीसदी बढ़कर 19.8 करोड़ हो चुकी है।

अमेरिका की स्थिति

‘कमर्शियल स्किपिंग’ के खिलाफ वर्तमान तर्क कॉपीराइट उल्लंघन के सिद्धांत पर आधारित है। WGN कंटीनेंटल ब्रॉडकास्टिंग कम्पनी बनाम यूनाइटेड विडियो, आईएनसी मामले में कोर्ट ने कमर्शियल स्किपिंग के आधार को कॉपीराइट का उल्लंघन बताते हुआ कहा: "एक कॉपीराइट लाइसेंस-धारक जो मौलिक रचना का संक्षिप्त संस्करण गैर-आधिकारिक तरीके से प्रकाशित करता है, वह एक उल्लंघनकर्ता है। किसी भी मौलिक रचना का गैर-आधिकारिक संपादन, अगर साबित होता है तो इस रचना में उसे कॉपीराइट का उल्लंघन माना जाएगा। या इसी तरह से रचना के अन्य किसी भी इस्तेमाल को भी, जो कि कॉपीराइट के प्रॉपर्टीयर को मिले लाइसेंस का अतिक्रमण करता हो।"

 

सातवें सर्किट ने आगे इसके संबंध में (1. कमर्शियल-स्किपिंग की वैधता- एम्सटर कॉपीराइट याचिका) अपनी धारणा को और भी स्पष्ट किया:-"एक गैर-आधिकारिक अमौलिक रचना के लिए की गई कमर्शियल स्किपिंग जिसे कमर्शियल-फ्री कॉपी कहा जाता है। यह कॉपीराइट-धारक की आमदनी को इसके असली प्रोग्राम से कम करेगा। क्योंकि फ्री टेलीविजन प्रोग्राम्स को एडवरटाइजर्स की तरफ से कमर्शियल खरीदने पर ही पैसा मिलता है।"

 

कोर्ट्स के पिछले न्याय व्यवस्थाओं के आधार पर वादी पक्ष को निम्न बातों को ही कॉपीराइट उल्लंघन के लिए साबित करना होता है।

1. वादी कॉपीराइट मैटीरियल का मालिक है, और

2. प्रतिवादी ने कॉपीराइट मालिक के किसी भी एक विशेषाधिकार का उल्लंघन किया हो।

यहीं पर, ‘एडब्लॉक प्लस’ से प्रभावित वेबसाइट्स आरोप लगाती हैं- कि निजी यूजर एक गैर-आधिकारिक अमौलिक काम कर रहा है। जब वह वेबसाइट के लेआउट से विज्ञापन हटाने के लिए एड ब्लॉकिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करता है। कॉन्ट्रीब्यूट्री कॉपीराइट इन्फ्रिंजमेंट (अंशदायी कॉपीराइट उल्लंघन) को साबित करने के लिए वादी को प्रतिवादी के (एडब्लॉक प्लस के) व्यवहार को इन तीन बिंदुओं में साबित करना होता है।

1. उल्लंघन में भागीदार होना

2. उल्लंघन की मंशा होना

3. उल्लंघन के साधनों का निर्माण करना

इन तीनों बातों को साबित करना मुश्किल नहीं होता। पहले बिंदु को साबित करने के लिए वादी को केवल एक प्रत्यक्ष उल्लंघन करने वाले की पहचान करना जरूरी होता है। जिसने एडब्लॉक प्लस को वेबसाइट पर विज्ञापनों को आने से रोकने के लिए इस्तेमाल किया।

एक व्यक्ति को तलाशना जिसने उक्त वेबसाइट को एडब्लॉक प्लस के इस्तेमाल के साथ एक्सेस किया, ज्यादा मुश्किल नहीं है। या उन लोगों की संख्या बताना जिन्होंने एडब्लॉक प्लस को डाउनलोड कर इन्सटॉल किया।

दूसरा बिंदु, कि वादी को यह दिखाना जरूरी होता है- कि एडब्लॉक प्लस का निर्माण करने वालों को इसकी जानकारी थी, कि इसके उत्पाद को दूसरों के कॉपीराइट का उल्लंघन करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। अगर एडब्लॉक प्लस का गैर-उल्लंघनकारी इस्तेमाल होता है। तब वादी को यह दिखाना होता है कि ना केवल एडब्लॉक प्लस को रचनात्मक ज्ञान (कन्सट्रक्टिव नॉलेज) था, कि यूजर्स इसके उत्पाद को उल्लंघन के उद्देश्य के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। बल्कि, यह भी कि इसने लोगों को उल्लंघन करने के उत्पाद का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित/प्रोत्साहित भी किया।

हालांकि, एडब्लॉक प्लस का मुख्य मकसद वेबसाइट्स से विज्ञापनों को ब्लॉक करना है- इसलिए गैर-आधिकारिक अमौलिक रचना तैयार करना है। ग्रॉक्सटर में कोर्ट ने कहा कि प्रोत्साहन दिखाना जरूरी नहीं भी हो सकता है, ‘रचनात्मक ज्ञान’ का सबूत ही काफी होगा। एडब्लॉक प्लस की लोकप्रियता के साथ इसे 2007 में पीसी वर्ल्ड के 100 सर्वश्रेष्ठ उत्पादों में शामिल किया गया। इससे लगता है कि इसे बनाने वाले को इस बात की जागरुकता थी कि ऐसे लोग हैं जो इस प्रोग्राम को विज्ञापनों को ब्लॉक करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

आखिर में,  ‘अंशदायी उल्लंघन’ का आरोप लगाने वाले वादी को ये दिखाना होगा कि एडब्लॉक प्लस ने अपने सॉफ्टवेयर को उल्लंघन करने के साधन के तौर पर यूजर्स को उपलब्ध कराया। वादी को ये साबित करने में कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है कि एडब्लॉक बनाने वालों ने यूजर्स को उत्पाद का इस्तेमाल करने के साधन उपलब्ध कराए। क्योंकि प्लग-इन मुफ्त में उपलब्ध है। यह केवल वेब ब्राउज़र्स के माध्यम से ही डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध है। कोर्ट को यह नतीजा निकालने में मुश्किल होगी कि एडब्लॉक प्लस ने उल्लंघन के लिए साधन उपलब्ध कराया, जबकि उत्पाद दूसरे की वेबसाइट के माध्यम से उपलब्ध हुआ।

हालांकि, दूसरी तरफ, कोर्ट A&M रिकॉर्ड्स, आईएनसी बनाम नैप्सटर मामले की परिस्थिति में इन तथ्यों के लिए दूसरी राय रख सकता है। जिसमें कोर्ट ने पाया कि नैप्सटर ने सपोर्ट सर्विसेज़ देकर वास्तव में म्यूज़िक एमपीथ्रीज़ के कॉपीराइट उल्लंघन में योगदान किया। "जिसके बिना नैप्सटर यूजर्स जरूरी म्यूजिक उतनी आसानी से ना खोज सकते हैं ना ही डाउनलोड कर सकते हैं, जिसके लिए प्रतिवादी गर्व करते थे।" 

मोज़ीला को उत्तरदायी ठहराए बिना, कोर्ट यह तय कर सकता है कि प्लग-इन डेवलेप करना और इसे मोज़ीला के माध्यम से डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध कराकर एडब्लॉक प्लस ने यह साबित कर दिया कि उसने उल्लंघन का साधन उपलब्ध कराया। हालांकि, अंशदायी कॉपीराइट उल्लंघन के मामले में किसी भी वेबसाइट के लिए उल्लंघन का आरोप लगाने की स्थिति में बाधाएं है। इसके अलावा भी मौलिक कॉपीराइट के दावे के लिए अन्य बिंदु भी हैं। जिन्हें साबित करना एक वेबसाइट के लिए मुश्किल होता है।

इन प्रारंभिक बिंदुओं को साबित ना कर पाने का मतलब हो सकता है कि एक वेबसाइट अपने केस को इतना तैयार नहीं कर पाएगी, जिससे ‘अंशदायी कॉपीराइट उल्लंघन’ को साबित किया जा सके।

पहला, जैसा कि पहले उल्लेख किया गया, अंशदायी उत्तरदायित्व के लिए कदम उठाने के योग्य होने से पहले एक वेबसाइट को पहले ये दिखाना होगा कि कॉपीराइट उल्लंघन हुआ है। इसके लिए, एक वेबसाइट मालिक को यह सबसे पहले दिखाना होगा कि वेबसाइट पर कॉपीराइट था। यह पहला स्पष्ट कदम है। लेकिन वेबसाइट के प्रकार पर निर्भर करते हुए दावे के लिए यह एक शुरुआती बाधा हो सकती है। गौरतलब है, अमेरिकी कॉपीराइट ऑफिस में वेबसाइट्स के प्रकारों के लिए स्पष्ट मानदंड हैं, जिनको यह कॉपीराइट देता है। जो वेबसाइट्स स्टैटिक नहीं हैं, या जो जल्दी-जल्दी अपडेट नहीं की जाती, उन्हें कॉपीराइट प्रोटेक्शन इल्यूसिव मिल सकता है। जैसा कि नियमों के मुताबिक, हर साइट को रिवीजन और अपडेट करना जरूरी होता है, जिससे एक नया रजिस्ट्रेशन फाइल किया जा सके।

कुल मिलाकर, मान लेते हैं कि एक वेबसाइट कॉपीराइट हासिल करने योग्य है। ऐसे में अगली बाधा होगी- वेबसाइट में शामिल किसी भी विज्ञापन (या विज्ञापनों के लिए आरक्षित स्थान) को कॉपीराइट में कवर किया जाए। इस बिंदु को साबित करने में कई बाधाएं हैं। अमेरिकी कॉपीराइट ऑफिस साफ तौर पर टेक्स्ट और डिजाइन के फॉर्मेट को तैयार करने वाले कम्प्यूटर कोड और इस कोड से तैयार किए जाने वाले कन्टेंट में फर्क समझता है। यह कोड कॉपीराइट किया जा सकता है पर कन्टेंट नहीं। ऐसे में इस सीमा के चलते नतीजा ये होगा कि वेबसाइट्स सफलतापूर्वक ये तर्क देने में सक्षम नहीं होंगी कि विज्ञापनों के लिए साथ में सेट किया गया स्पेस कॉपीराइट करने योग्य है। हालांकि, एडब्लॉक प्लस को एक अंशदायी कॉपीराइट उल्लंघनकर्ता कहने के लिए जरूरी मानदंड बिल्कुल सीधा लगता है या कहें बिल्कुल आसान लगता है। लेकिन वेबसाइट को ये साबित करने के लिए आने वाली परेशानियां ऐसे दावों के लिए अजेय बाधा साबित होती हैं।

जर्मन/यूरोपीय स्थिति

जर्मन कोर्ट ने सॉफ्टवेयर फर्म Eyeo GmbH के पक्ष में फैसला सुनाया है। ऐसे में प्रतिवादी का कहना है कि इसने किसी भी प्रतियोगिता या कॉपीराइट कानून का उल्लंघन नहीं किया। साथ ही उन दलीलों को खारिज कर दिया जो वादी प्रकाशकों की तरफ से सामने रखी गईं। इसी तरह के मुकदमे प्रतिवादियों की तरफ से दो संबंधित कोर्ट्स में दायर किए गए- म्यूनिख और कोलोने,  जिसमें भी यही नतीजे निकले। कोर्ट्स ने इंटरनेट यूजर्स की गोपनीयता का और बिना किसी हस्तक्षेप के स्वतंत्र रूप से इंटरनेट ब्राउज़ करने की स्वतंत्रता का तर्क बरकरार रखा।

इस फैसले ने जर्मनी और यूरोप में विवाद पैदा कर दिया है। जहां यूजर्स ने कोर्ट्स के फैसले का स्वागत किया है।

भारतीय स्थिति

भारत में स्थिति थोड़ी अलग है। साधारण तौर पर वेबसाइट्स को कोई संरक्षण नहीं मिला है। लेकिन एक बार मौलिकता का मानदंड सिद्ध हो जाए, तो इसे "साहित्यिक रचना" के तौर पर संरक्षण मिल जाता है। वेबसाइट्स को संरक्षण कन्टेंट के मुताबिक दिया जाता है। जिसे वे अपनी वेबसाइट पर होस्ट करते हैं। इसलिए हर एक कंटेंट पर उन्हें अलग से कॉपीराइट एप्लीकेशन करना होता है। ऐसे में कहा जा सकता है कि विज्ञापनों को वेबसाइट का एक हिस्सा बनाया जाता है और रजिस्ट्रैंट की तरफ से यूजर के लिए तय किए गए रूप में पेश किया जाता है। वेबसाइट में विज्ञापनों को ब्लॉक कर किसी भी तरह के परिवर्तन, व्युत्पत्ति, सुधार को वेबसाइट मालिक/रजिस्ट्रैंट के उसकी वेबसाइट पर अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा। इस प्रकार ‘कमर्शियल स्किपिंग’ भारत में उल्लंघन के समान है। वादी को एडब्लॉक प्लस के उल्लंघन में योगदान को साबित करना होगा। ऐसे में किसी भी अधिकारक्षेत्र में प्राथमिक उल्लंघनकर्ता यूज़र खुद होगा, जो जानबूझकर एडब्लॉक प्लस के फीचर्स का इस्तेमाल कर रहा है।

परिणाम

हालांकि, भारत में कमर्शियल स्किपिंग को लेकर न्यायिक मुकदमों की कमी रही है। फिर भी भारतीय न्यायपालिका के कानूनों के प्रावधानों की व्याख्या के बारे में अपरिपक्व धारणा बनाना गलत होगा। फिर भी, अंतर्राष्ट्रीय संकल्पनाओं को ध्यान में रखते हुए ‘एडब्लॉक प्लस’ के पक्ष में राय रखना गलत नहीं होगा। यह स्वतंत्र रूप से इंटरनेट ब्राउज़ करने के लिए जरूरी है।

(लेखक अंकित चतुर्वेदी अधिवक्ता हैं जो टीएमटी लॉ प्रैक्टिस, नई दिल्ली से एसोसिएट के तौर पर जुड़े हैं)