विचाराधीन कैदियों को मिलेगा तोहफा, जमानत की शर्तें होगी आसान

नई दिल्ली (24 मई ): भारत की न्यायिक प्रक्रिया में सबसे बड़ी त्रासदी जेल में सजा काट रहे कैदियों के लिए है जिन्हें केवल इस वजह से जमानत नहीं मिल पाती, क्योंकि आर्थिक तौर पर वह अक्षम हैं तो कई ऐसे भी हैं जो कई सालों तक जेल में यूं ही बंद रहते हैं।

अब सरकार उन विचाराधीन कैदियों को खुशियों की सौगात देने जा रही है जो खतरनाक श्रेणी के नहीं हैं और अपनी सजा का एक तिहाई हिस्सा या ढाई साल जेल में काट चुके हैं। इन्हें जमानत पर रिहा होने के लिए केवल अपनी पहचान से संबंधित दस्तावेज ही देने होंगे।

 लॉ कमीशन इन कैदियों को राहत देने के लिए जल्दी क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (सीआरपीसी) की धारा 436 ए में संशोधन की सिफारिश करने जा रहा है। विचाराधीन कैदियों के बाबत लॉ कमीशन को नया एक्ट बनाने का जिम्मा कानून मंत्रालय ने दिया था। इसमें केवल उन कैदियों को शामिल किया जाएगा जो किसी ऐसे अपराध में विचाराधीन हैं जिसमें सात साल तक की सजा हो सकती है।

कमीशन के एक अधिकारी ने बताया कि नए एक्ट की बजाए मौजूदा धारा में संशोधन ही पर्याप्त होगा। उनका कहना है कि अभी इस बात पर विचार किया जा रहा है कि अगर पहचान के आधार पर जमानत लेने के बाद कोई कैदी वापस नहीं लौटा तो उस स्थिति से निपटने के लिए क्या उपाय किए जाए। उनका कहना है कि यह सवाल बड़ा है और इस पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।

अधिकारी का कहना है कि अभी देखने में आया है कि मौजूदा धारा उन कैदियों के लिए मुफीद है जो आर्थिक तौर पर सक्षम होते हैं। जमानत के लिए श्योरिटी देने में इन्हें परेशानी नहीं होती है, लेकिन उनका क्या जो आर्थिक तौर पर बेहद कमजोर हैं। वो अपनी रिहाई के लिए श्योरिटी कहां से लेकर आए। अधिकारी का कहना है कि एक्ट में संशोधन के दौरान इस बात का ख्याल रखा जाएगा कि आदतन अपराधियों के साथ उन कैदियों को इससे बाहर रखा जाए जो जेल से निकलने के बाद समाज के लिए खतरा बन सकते हैं। अगर ऐसे कैदी जमानत पर रिहा हो गए तो कानून व्यवस्था की स्थिति बहाल रखने में परेशानी होगी।