भगत सिंह ने देशवासियों के नाम लिखा था ये आखिरी पत्र

नई दिल्ली (23 मार्च): देश के लिए शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने फांसी के फंदे को चूम लिया था। 23 मार्च 1931 को इन तीनों मतवालों को समय से पूर्व ही फांसी दी गई। फांसी के तख्ते पर चढ़ने से पहले भगत सिंह ने देशवासियों के नाम एक खत लिखा था। 28 सितंबर 1907 को जन्मे इस महान क्रांतिकारी और देश के सच्चे सपूत को आज पूरा देश याद कर रहा है।

भगत सिंह का आखिरी पत्र...  'साथियो! स्वाभाविक है जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए। मैं इसे छिपाना नहीं चाहता हूं लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं कि कैद होकर होकर न रहूं। मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। क्रांतिकारी दलों के आदर्शों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है। क्रांतिकारी आदर्शों ने मुझे इतना ऊंचा उठा दिया है कि जीवित रहने की स्थिति में मैं इससे ऊंचा नहीं हो सकता। मेरे हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ने की सूरत में देश की माताएं अपने बच्चों से भगत सिंह की उम्मीद करेंगी। इससे आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना नामुमकिन हो जाएगा। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाए।' 

कहते हैं फांसी से पहले भगत सिंह ने बुलंद आवाज में देश के नाम एक संदेश भी दिया था। उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए कहा था कि मैं यह मानकर चल रहा हूं कि आप वास्तव में ऐसा ही चाहते हैं। अब आप सिर्फ अपने बारे में सोचना बंद करें, व्यक्तिगत आराम के सपने को छोड़ दें, हमें इंच-इंच आगे बढ़ना होगा। 

उन्होंने देशवासियों को भविष्य की राह दिखाते हुए जेल की चारदीवारी से ही कहा था, 'इस महान लक्ष्य को पाने के लिए साहस, दृढ़ता और मजबूत संकल्प चाहिए। कोई भी मुश्किल आपको रास्ते से डिगाए नहीं। किसी विश्वासघात से दिल न टूटे। पीड़ा और बलिदान से गुजरकर आपको विजय प्राप्त होगी। यह व्यक्तिगत जीत क्रांति की बहुमूल्य संपदा बनेंगी।'