जानिए, कौन थे बाबा बंदा सिंह बहादुर

विशाल एंगरीश, कुंदन सिंह, नई दिल्ली (3 जुलाई): एक योद्धा जिसने मुगलों को हराया, एक योद्धा जिसने सिखों का नाम बढ़ाया, वो शूरवीर जिसका नाम इन दिनों सियासत में खूब गूंज रहा है। उस शूरवीर की पूरी कहानी आज हम आपको बताएंगे, कहानी बाबा बंदा सिंह बहादुर की।

वो बंदा था गोविंद का, वो बहादुर था भारतवर्ष का, सतलुज से यमुना तक जिसकी वीरता के किस्से थे। 15 साल की उम्र में जिसने तलवार थामी थी। जिसके पराक्रम से मुगल शासक कांपने लगे थे। दुश्मनों को तबाह करने को जो शेर की तरह दहाड़ता था। उस शूरवीर बंदा बहादुर को आज की सियासत में खूब याद किया जा रहा है। बंदा बहादुर की याद में दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने पुल का नाम बदल डाला। अखबार में बड़े बड़े इश्तेहार दिए गए।

तो मोदी सरकार ने केजरीवाल को जवाब देने के लिए बाबा के नाम पर पोस्टल कवर जारी कर दिया। बाबा के नाम का चांदी का सिक्का जारी किया और दिल्ली में धूम धाम से शहीदी दिवस मनाया। खुद प्रधानमंत्री ने बंदा बहादुर पर एक किताब का विमोचन किया। आज हम आपको उसी योद्दा की पूरी कहानी बताएंगे जिसने मुगलों को हराया। सिखों का मान बढाया।

बाबा बंदा सिंह बहादुर वो सिख सेनापति थे जिन्होंने 300 साल पहले मुगलों को चने चबवा दिए थे। एक एक कर कई मुगलों को शिकस्त दी, गुरु गोबिंद सिंह के शिष्य बंदा बहादुर ने खालसा राज की नींव रखी। सालों से चली आ रही जमींदारी प्रथा को खत्म करके किसानों को छुड़वाया। उस बंदा बहादुर का नाम सियासत में खूब गूंज रहा है कैसे और क्यों सियासत में आया बंदा बहादुर का नाम ये बताएं उससे पहले देखिए बंदा बहादुर की पूरी कहानी।

16 अक्टूबर 1670 को पुंछ, कश्मीर में जन्म हुआ सिखों के सबसे शूरवीर सेनापती बंदा सिंह बहादुर का। जन्म कश्मीर में हुआ लेकिन उन्होंने वीरता के किस्से गढ़े पंजाब में। सिखों के सबसे पहले सेनापति थे बंदा सिंह बहादुर। जिन्होंसे सबसे पहले खालसा राज की स्थापना की। 300 साल पहले मुगलों की नाक में दम कर दिया था बाबा बंदा सिंह बहादुर ने। वो वक्त था 1708 का, सिखों के दसवें गुरू ने पहली बार बंदा बहादुर को दक्षिण के बंदा आश्रम में देखा। उस वक्त उनका नाम था माधोदास। गुरु गोविंद सिंह ने माधोदास को नाम दिया बंदा बहादुर का।

गुरू गोविंद सिंह का शिष्य बनने के बाद बंदा बहादुर ने मुगलों को सबसे पहला झटका दिया सरहिंद के फौजदार वज़ीर खान का कत्ल करके, वज़ीर खान ने गुरू गोविंद सिंह के दो बच्चों की हत्या की थी। 

वजीर खान का कत्ल करने के बाद बंदा बहादुर ने अपनी फौज को और बढ़ा किया। मुगलों के जुल्मों से लड़ने के लिए ताकत बढ़ाई, बंदा बहादुर की ताकत इतनी बढ़ गई कि यमुना से लेकर सतलुज के प्रदेशों तक सिर्फ एक नाम गूंजने लगा बंदा बहादुर का। यमुना और सतलुज के सारे राज्य बंदा बहादुर ने जीत लिए और फिर तैयार किया एक मजबूत किला। 

1708 से लेकर 1715 बंदा बहादुर मुगलों के लिए काल बने रहे। इस दौरान इस बंदा बैरागी ने अपने राज में सदियों से चली आ रही जमींदारी प्रथा को खत्म कर दिया। सालों से बड़े बड़े जमींदारों और जागीरदारों के बोझ तले दबे मजदूरों को उनसे मुक्त करा दिया। सिखों के गुरू का सिक्का तक चलवा दिया।

बाबा बंदा सिंह बहादुर ने मुगलों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। लेकिन उनके राज में मुसलमानों को कभी कोई तकलीफ नहीं सहनी पड़ी। उनके राज में मुसलमानों को हर तरह की धार्मिक स्वतंत्रता दी गई। पांच हजार मुसलमान भी उनकी सेना में थे। सेना में अपनी नमाज और खुतबा पढ़ने की भी स्वतंत्रता थी। बंदा सिंह बहादुर ने पूरे राज्य में ये घोषणा कर दी थी कि मुसलमानों को कोई किसी तरह की क्षति नहीं पहुंचाएगा।

बाबा बंदा सिंह बहादुर ने 1715 से पहले मुगलों को इतनी शिकस्त दी कि उन्हें बंदा बहादुर से लोहा लेने के लिए एक होना पड़ा। साल 1715 में मुगल बादशाह फर्रुखसियर की शाही फौज ने अब्दुल समद खां के नेतृत्व में गुरदासपुर के किले में बंदा बहादुर को घेर लिया। कई महीनों तक लड़ाई चलती रही। मुगलों की लाखों की फौज के सामने बंदा बहादुर के सैकड़ों जवान सीना तान कर लड़ते रहे। किले की मजबूत दीवारों को भेदने में मुगलों के पसीने छूट गए। कई महीनों की घेराबंदी के बाद किले में खाने पीने का सामान खत्म हो गयाछ। और आखिरकार बंदा बहादुर और उनकी फौज ने आत्मसमर्पण कर दिया। मुग़लों ने क़िला फतह करने के साथ साथ बन्दा और उनके साथियों को बन्दी बना लिया।

फरवरी 1716 को 794 सिक्खों के साथ मुगल उन्हें भी दिल्ली लाए। बताया जाता है कि मुगल शासकों ने बंदा बहादुर और उनके साथियों को इस्लाम कबूल करने के लिए कई यातनाएं दी। लेकिन बंदा बहादुर टस से मस नहीं हुए। मुगलों ने बंदा बहादुर को डिगाने के लिए रोज 100 सिक्खों का कत्ल किया और कुछ दिन बाद क्रूर फर्रुखसियर के आदेश के बाद बंदा बहादुर को भी दर्दनाक मौत दे दी गई। कहा जाता है कि उन्हें हाथी के पैरों तले कुचल दिया गया।

कल तक बाबा बंदा बहादुर की शहादत को कोई याद नहीं करता था। कोई शहादत का नाम लेने वाला नहीं था। लेकिन अब अचानक ये नाम हर पार्टी के हर नेता की जुबान पर आ गया है। केजरीवाल सरकार से लेकर मोदी सरकार तक, बाबा बंदा बहादुर का नाम लेकर पंजाब की सियासत जीतने की कोशिश में लगी हैं। केजरीवाल सरकार ने पुल का नाम रखा तो मोदी सरकार ने सिक्का जारी करवा दिया। 

इन दिनों सियासत में आजकल एक नाम छाया हुआ है। बाबा बंदा सिंह बहादुर का। बंदा सिंह बहादुर का नाम इससे पहले देश के दूसरे कोने में शायद ही कोई जानता था लेकिन आज ये नाम सियासत के दौर में छाया हुआ है। 

आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिख वीर बाबा बंदा सिंह बहादुर के 300 वीं शहादत दिवस के मौके पर शरीक हुए। इस कार्यक्रम में मोदी ने हाल ही में बंदा सिंह बहादुर के नाम पर निकाले गए सिक्के का लोकार्पण किया साथ ही मोदी ने बहादुर सिंह पर लिखी किताब का भी लोकार्पण किया। इस कार्यक्रम की आयोजक पंजाब सरकार और सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी है।

बंदा सिंह बहादुर का नाम राजनीति में पहली बार तब आया जब केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के मशहूर बारापुला एलिवेटिड रोड का नाम बदलकर बंदा बहादुर के नाम पर रखने का एलान किया। अब बारापुला फ्लाईओवर का नाम बाबा बंदा बहादुर सेतु हो गया है। दरअसल बाबा बंदा सिंह बहादुर शहीद हुए थे महरौली के कुतुबमिनार के पास लेकिन जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ उस जगह पर अब ये पुल बना हुआ है।

केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के बारापुला पुल का नाम बाबा बंदा बहादुर के नाम कर दिया। तो केंद्र ने इसका जवाब कुछ यूं दिया कि पिछले दिनों सरकार के पोस्टल विभाग ने सबसे पहले बाबा के नाम पर पोस्टल कवर जारी किया। और फिर केंद्रीय वित्त मंत्री के करकमलों से चांदी का सिक्का जारी करवा दिया गया। 

बादल सरकार तो अपने एक विज्ञापन में बाबा बंदा सिंह की प्रतिमा को भी दिखा रही है। अभी ये साफ नहीं है कि ये प्रतिमा कहां लगाई जाएगी, लेकिन प्रतिमा बनकर तैयार खड़ी है। मूर्ति को लगाने को लेकर लड़ाई दिल्ली में भी चल रही है, दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी ने बाबा बंदा सिंह बहादुर की प्रतिमा लगाने की तैयारी शुरू कर दी थी।

कमेटी ने प्रतिमा लगाने के लिए दिल्ली विकास प्राधिकरण से अनुमति मांगी। डीडीए ने कमेटी के इस आवोदन को दिल्ली सरकार के पास भेज दिया। दिल्ली सरकार ने इस पर संज्ञान लिया फिर कमेटी को कोर्ट के आदेश का हवाला दते हुए पार्क में प्रतिमा लगाने पर रोक लगा दी।

दरअसल ये सब कुछ हो रहा है पंजाब चुनाव के लिए जो सिर पर है। पंजाब चुनाव में अपनी पैठ बनाने के लिए सियासी पार्टियां बाबा बंदा बहादुर के नाम को भुना रही हैं। इतिहास कहता है कि बाबा बंदा सिंह बहादुर सिख समाज के सम्मान के लिए मुगलों से लोहा लेते हुए कुर्बान हुए थे। आज बाबा के नाम पर राजनीति करने वाले लोग एकदूसरे से लोहा ले रहे हैं।