आजादी की लड़ाई के दौरान बिछड़े थे पति-पत्नी, 72 साल बाद मिले

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (29 दिसंबर): केरल में कन्नूर में एक दंपती 72 साल तक बिछड़े रहने के बाद फिर एक दूसरे से मिले। शुक्रवार को 93 वर्षीय ई के नारायणन 72 साल बाद अपनी पूर्व पत्नी से मिले। नारायणन को 1946 में केरल के कावुमबाई गांव में हुए हिंसक किसान आंदोलन में भाग लेने के चलते सजा हो गई थी। 72 साल बाद जब वह अपनी पूर्व पत्नी शारदा (89) से मिले तो दोनों कुछ बोल ही नहीं पाए और दोनों की आंखों में आंसू भर आए।72 साल बाद केरल के पारासिनिकादवू में शारदा के बेटे भार्गवन के घर पर नारायणन से शारदा की मुलाकात हुई। इस मुलाकात में दोनों की ही आंखें भरी हुई थीं और हजारों अनकही बातों के बावजूद दोनों एकदम चुप बैठे थे। लंबे अरसे बाद हुए इस मिलन के बाद नारायणन और शारदा आंसू पोछते एक-दूसरे के पास चुपचाप बैठे रहे। जब नारायणन ने शारदा से पूछा कि वह चुप क्यों हैं, कुछ बोल क्यों नहीं रहीं, तो शारदा का जवाब था कि वह किसी से गुस्सा नहीं हैं। बताया गया कि जब दोनों की शादी हुई तो नारायणन मात्र 17 और शारदा 13 साल की थीं।

किसान आंदोलन में हिस्सा लेने के चलते हुई थी सजा

शादी के 10 महीने बाद ही नारायणन और उनके पिता तलियान रमन नांबियार ने कावुमबाई आंदोलन का नेतृत्व किया और फिर अंडरग्राउंड हो गए। दो महीने बाद दोनों पकड़े गए और उन्हें जेल भेज दिया गया। पुलिस इनके घर पर किसी भी समय आ जाती थी, जिसके चलते शारदा अपने मायके चली गईं। नारायणन के भजीते मधु कुमार ने बताया कि उनका घर भी जला दिया गया।नारायणन को आठ साल की सजा हुई। उनके पिता को सलेम जेल के अंदर ही 11 फरवरी 1950 को किसी ने गोली मार दी। कुछ सालों बाद शारदा की दूसरी शादी करवाने का फैसला किया। 1957 में जेल से रिहा होने के बाद नारायणन ने भी दूसरी शादी कर ली। सालों बाद शारदा के बेटे भार्गवन को नारायणन के किसी रिश्तेदार से पता चला कि दोनों के परिवार में कोई संबंध है।तभी नारायणन और शारदा को मिलाने की बात हुई। भार्गवन ने बताया कि पहले तो उनकी मां (शारदा) नारायणन से मिलने को राजी ही नहीं हो रही थीं लेकिन बड़ी मान-मनौव्वल के बाद वह तैयार हुईं। इस मौके पर भार्गवन के परिवार की ओर सद्या (भोज) का भी आयोजन किया गया। दोनों परिवारों ने जल्द ही फिर से मिलने का वादा भी किया। बताया गया कि 30 साल पहले विधवा हो चुकीं शारदा के कुल छह बच्चे हुए, जिसमें से चार ही जिंदा हैं। वहीं नारायणन की पोती शांता कवुमबाई 'दिसंबर 30' के नाम से किसानों के संघर्ष पर किताब भी लिख चुकी हैं। पूरे परिवार के लिए शारदा और ईके नारायणन का यह मिलन बहुत भावुक क्षण था।