'राजेंद्र कुमार को शेषनाग जैसा बताया जा रहा है जो दिल्ली सरकार का सारा बोझ उठाए हों'

नई दिल्ली (5 जुलाई) :  कथित भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार  दिल्ली सरकार के प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार सभी 5 आरोपियों को स्पेशल कोर्ट ने 5 दिन की सीबीआई हिरासत में भेज दिया। इससे पहले सीबीआई ने विशेष अदालत को बताया था कि आईएएस राजेंद्र सिंह गवाहों को धमकाने की कोशिश कर रहे थे। स्पेशल सीबीआई जज अरविंद कुमार ने राजेंद्र कुमार, केजरीवाल के दफ्तर में उप सचिव तरुण शर्मा, अशोक कुमार (राजेंद्र कुमार के सहायक) और एक प्राइवेट फर्म के मालिकों- संदीप कुमार और दिनेश गुप्ता को सीबीआई हिरासत में भेजने का आदेश दिया था।

सुनवाई के दौरान सीबीआई ने 10 दिन की हिरासत मांगी थी। साथ ही कहा था कि राजेंद्र कुमार को गिरफ्तार किए बिना इस मामले की निष्पक्ष सुनवाई असंभव है क्योंकि राजेंद्र कुमार गवाहों पर दबाव डालने की कोशिश कर रहे हैं।  

इस पर जज ने पूछा, क्या गवाहों को धमकाने की कोई घटना हुई है। इस पर सीबीआई के अधिकारी ने हां में जवाब दिया। सीबीआई अधिकारी ने कहा कि उनके पास ऐसे गवाहों के बयान दर्ज हैं। सीबीआई ने कहा कि उनके पास एक ऑडियो सीडी है जिसमें राजेंद्र कुमार गवाहों को प्रभावित कर रहे हैं। जरूरत पड़ने पर सीबीआई कोर्ट के सामने वो सीडी उपलब्ध करा देगी।

कोर्ट में सीबीआई ने कहा कि राजेंद्र कुमार की गिरफ्तारी पर दिल्ली सरकार बेवजह मीडिया हाइप बना रही है। दिल्ली सरकार राजेंद्र कुमार को ऐसे बता रही जैसे वो शेषनाग हों और दिल्ली सरकार का सारा बोझ अपने सिर पर उठा लिया हो।

कोर्ट ने सीबीआई से भी कई सवाल पूछे। कोर्ट ने पूछा कि जब केस 7 महीने पहले दर्ज किया था तो अब जाकर गिरफ्तारी क्यों की? 

सीबीआई का आरोप है कि राजेंद्र कुमार ने अलग-अलग महकमों की जिम्मेदारी संभालते हुए अपनों के नाम बनाई कई फर्जी कंपनियों को फायदा पहुंचाया। सूत्रों के मुताबिक एजेंसी की एफआईआर में कहा गया है कि 2006 में एंडेवर्स सिस्टम्स नाम की कंपनी बनाई गई। ये राजेंद्र कुमार और अशोक कुमार की फ्रंट कंपनी है। दिनेश कुमार गुप्ता और संदीप कुमार इसके निदेशक थे। ये कंपनी सॉफ्टवेयर और सॉल्यूशन मुहैया कराती थी।

 

2007 में राजेंद्र कुमार ने दिल्ली सरकार की ओर से हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की खरीद के लिए ICSIL का एक पैनल बनाने की प्रक्रिया शुरू की। 2007 में राजेंद्र कुमार दिल्ली ट्रांसपोर्ट लिमिटेड के सचिव बनाए गए। बिना उचित टेंडर के वे ठेके बांटते रहे। यह कुल मिलाकर 50 करोड़ रुपये का घोटाला है।