खौफ खाते थे पाकिस्तान के सैनिक करिगल के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा से, पढिए पूरी कहानी


नई दिल्ली(7 जुलाई): करगिल युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच मई से जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के करगिल जिले में हुए सशस्त्र संघर्ष का नाम है। आज 18 साल बीत जाने के बाद भी कारगिल की खट्टी-मिट्ठी यादें हर भारतवासी के जेहन में हैं।


- भारत मां के लिए युद्ध के हवन कुंड में अपने प्राणों की आहुति देने वाले परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा की आज 18वीं पुण्यतिथि है।


- करगिल विजय के हीरो रहे कैप्टन विक्रम बत्रा को उनके सहयोगी शेरशाह बुलाते थे। यह उनका कोड नेम भी था और पाकिस्तानी भी इस कोड नेम से अच्छी तरह वाकिफ थे। कैप्टन विक्रम बत्रा वो नाम था, जिसकी पाकिस्तानी खेमे में दहशत थी। करगिल युद्ध के बाद जीत का जश्न मनाने के लिए कैप्टन बत्रा भले ही मौजूद ना रहे हों, लेकिन उनके द्वारा लगाया गया नारा 'ये दिल मांगे मोर' आज भी हर हिंदुस्तानी के जेहन में है। चोटी 4875 फतह करते हुए वे आज ही के दिन शहीद हुए थे। श्रीनगर-लेह मार्ग पर सबसे अहम चोटी 5140 पर जीत के बाद कैप्टन बत्रा ने रेडियो के जरिए विजय उद्घोष ये दिल मांगे मोर कहा था, जो देश भर में बेहद लोकप्रिय हुआ।


- कैप्टन बत्रा को करगिल का शेर भी कहा जाता था। करगिल युद्ध के दौरान 1 जून 1999 को उन्हें प्वाइंट 5140 को फतेह करने के लिए भेजा गया, जो 17000 फीट की ऊंचाई पर थी। इसी ऑपरेशन में कैप्टन बत्रा को शेरशाह नाम दिया गया। बत्रा जब अपनी टीम के साथ ऊपर चढ़ रहे थे तो ऊपर बैठे दुश्मनों ने फायरिंग शुरू कर दी।


- कैप्टन बत्रा ने अपने साथियों के साथ अदम्य साहस और बहादुरी का परिचय देते हुए 20 जून 1990 को प्वाइंट 5140 पर भारत का झंडा लहराया इसके अलावा उन्होंने प्वाइंट 5100, 4700, 4750 और 4875 पर भी जीत का परचम लहराया। चोटी 4875 पर जंग के दौरान बत्रा अपने जूनियर लेफ्टिनेंट नवीन को बचाने के लिए दुश्मन की गोलियां अपने सीने पर झेलकर देश के लिए कुर्बान हो गए।

- कैप्टन बत्रा के अंतिम शब्द थे, "अगर मैं युद्ध में शहीद होता हूं तो भी तिरंगे में लिपटा आऊंगा और अगर जीत कर आऊंगा तो भी तिरंगे में लिपटा आऊंगा।"