उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य से अलग होना चाहते हैं कन्हैया?

नई दिल्ली (20 मार्च): क्या जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार खुद को 9 फरवरी वाली घटना से अलग करना चाहते हैं? यह सवाल कुछ शिक्षक और छात्र धीमी आवाज में पूछ रहे हैं। कन्हैया कुमार ने हाल ही में एक मीडिया कॉन्क्लेव में कहा था कि वह उस जगह पर मौजूद नहीं थे जहां भारत विरोधी नारे लगाए गए।   ऐसा पहली बार नहीं है जब कन्हैया के रवैये पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इससे पहले भी कन्हैया ने उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को राजद्रोह मामले में गिरफ्तार किए जाने पर चुप्पी साध रखी थी जिस पर हैरत जताई जा रही थी। लेफ्ट ग्रुप, छात्रों और शिक्षकों के एक तबके को लग रहा है कि कन्हैया ने अपनी सुविधा को देखते हुए उमर खालिद और अनिर्बान को अवॉइड किया। इसके बजाय उन्होंने केंद्र पर हमले करने के लिए तमाम तरकीबें इस्तेमाल कीं। तीन मार्च को अपनी रिहाई के बाद कन्हैया ने जेएनयू के छात्रों के बारे में सीधे तौर पर बात नहीं की और न अगले दिन ही गंगा ढाबा पर आयोजित 'विक्ट्री मार्च' के दौरान इस बारे में कोई बात की।   स्कूल ऑफ सोशल सायंसेज के एक प्रफेसर ने कहा,'उसके स्पीच का पैटर्न काफी घिसा-पिटा है। वह सिर्फ आरएसएस द्वारा देश की नीतियों को कंट्रोल करने और भारत में आजादी के नए नारे के बारे में बात करता है। क्या यह सब जानबूझ कर किया गया ताकि उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को फोकस से बाहर रखा जा सके?' 

आइसा के एक ऐक्टिविस्ट ने कहा,'हमें उमर और अनिर्बान की रिहाई के बाद काफी राहत मिली है। लेकिन हम चाहते थे कि रिहाई के बाद कन्हैया और ऐक्टिव होकर आए और बाकी कॉमरेडों की रिहाई के लिए जोर-शोर से आवाज उठाएं। इसमें कोई शक नहीं कि लेफ्ट ग्रुप में भी विचारधाराओं का अंतर है लेकिन हम सब उनकी रिहाई के समर्थन में खड़े थे।'   हालांकि उमर की बहन कुलसुम फातिमा ने कहा कि कन्हैया से हर भाषण में उमर और अनिर्बान का जिक्र करने की अपेक्षा न्यायसंगत नहीं होगी।