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पादरी बनना चाहते थे जस्टिस कुरियन जोसेफ, लेकिन बन गए सुप्रीम कोर्ट के जज

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस कुरियन जोसेफ गुरुवार को अपने पद से रिटायर हो गए। सुप्रीम कोर्ट कवर करने वाले पत्रकारों को आज अपने सरकारी आवास पर चाय पिलाने के लिए बुलाये थे। पत्रकार चाय पर गए तो लेकिन अपने ढेर सारे सवालों के साथ। जस्टिस कुरियन भी तैयार थे मुस्कुराते हुए अपने जवाब के साथ। सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों को छोड़कर उन सभी सवालों के जवाब दिये दिल खोलकर।

प्रभाकर मिश्रा, नई दिल्ली (30 नवंबर): सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस कुरियन जोसेफ गुरुवार को अपने पद से रिटायर हो गए। सुप्रीम कोर्ट कवर करने वाले पत्रकारों को आज अपने सरकारी आवास पर चाय पिलाने के लिए बुलाये थे। पत्रकार चाय पर गए तो लेकिन अपने ढेर सारे सवालों के साथ। जस्टिस कुरियन भी तैयार थे मुस्कुराते हुए अपने जवाब के साथ। सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों को छोड़कर उन सभी सवालों के जवाब दिये दिल खोलकर। 
जस्टिस कुरियन ने पत्रकारों से मुखातिब होते ही मुस्कुराते हुए कहा 'किसी जज के यहां एक साथ इतने पत्रकार दूसरी बार इकट्ठा हुए हैं।' पहला मौका था जस्टिस चलमेश्वर के आवास पर आयोजित 12 जनवरी को तत्कालीन मुख्यन्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ चार जजों का वह प्रेस कॉन्फ्रेंस जिसने देश में भूचाल ला दिया था, उन चार जजों में जस्टिस कुरियन जोसेफ भी शामिल थे।

सबसे पहला सवाल उसी प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर किया गया जब पत्रकारों ने पूछा कि क्या उन्हें आज उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने का कोई खेद है तो जस्टिस कुरियन जोसेफ का जवाब था कि ' मुझे कोई खेद नहीं है, प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का फैसला सोच समझकर लिया गया और  ऐसा इसलिए किया क्योकि कोई  दूसरा रास्ता नहीं बचा था। सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था के हित के लिए ऐसा किया।' अगला सवाल था कि क्या प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद अब सब कुछ ठीक हो गया ? जवाब था -'अभी सब कुछ ठीक नहीं हुआ, उसमे वक्त  लगेगा। लेकिन  बदलाव की शुरुआत हो गई है, ये पुराने चीफ जस्टिस के रहते ही हो गई थी।'

माई लार्ड की अदालत में अगला सवाल था 'आपने प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के बजाए, फूल कोर्ट मीटिंग क्यों नहीं बुलाई ? जवाब था - 'जज खुद  से फुल कोर्ट मीटिंग नहीं करवा सकते। यह फैसला चीफ जस्टिस ही ले सकते थे और उन्होंने ऐसा कई बार आग्रह के बाद भी ऐसा नहीं किया।'

सवाल इस बात को लेकर भी हुआ कि 'क्या कोर्ट में लंबित किसी मामले में सरकार के तरफ से दबाव होता है?'  जवाब था - नहीं, जहां तक एक जज के अपने न्यायिक अधिकार के इस्तेमाल की बात है, उस पर सरकार के दबाव को उन्होंने कभी महसूस नहीं किया। हाँ, कई बार जजों की नियुक्ति , ट्रांसफर से जुड़ी फाइलों को क्लियर करने में सरकार की ओर देरी होती है। तो फैसलों की डिलवरी में नही, लेकिन प्रशासनिक लेवल पर अप्रत्यक्ष तौर पर दखल रहता ही है। 

               जस्टिस कुरियन जोसेफ के साथ  न्यूज़ 24 के पत्रकार प्रभाकर मिश्रा
 हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को लेकर हुए राजनीतिक बयानबाजी पर भी सवाल हुआ। खासतौर  पर अयोध्या, सबरीमाला मामले की सुनवाई को लेकर केंद्रीय मंत्री के बयानों पर पत्रकारों ने जस्टिस जोसेफ की प्रतिक्रिया मांगी। लेकिन माई लार्ड ने बड़ी चतुराई से मुस्कुराते हुए संदेश दे दिया कि 'एक बार जब सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला सुनाता है तो वो Law of the Land बन जाता है।अगर राजनीतिक दलों को उस फैसले के अमल को लेकर कोई दिक्कत है तो वो क्लेरफिकेशन के लिए कोर्ट का रुख सकते है।

अब एक ऐसे सवाल की बारी थी जो सभी रिटायर होने वाले सुप्रीम कोर्ट जज से पूछा जाता है 'क्या किसी जज को रिटायर होने के बाद सरकार द्वारा ढ़िये हुए पद को स्वीकार करना चाहिए?' सीधा और सरल जवाब था - 'जबतक सरकार को लगता है कि रिटायरमेंट के बाद जजों को कोई पद देकर सरकार उनपर 'कृपा' कर रही है तो जजों को ऐसे पद को स्वीकार नहीं करना चाहिए। लेकिन अगर पूरे सम्मान के साथ, सरकार जजों से आग्रह करती है, तो फिर पद को स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं है।' जस्टिस कुरियन जोसेफ पहले ही कह चुके हैं कि वह सरकार द्वारा दिया हुआ कोई स्वीकार नहीं करेंगे।

जस्टिस कुरियन जोसेफ ने यह भी बताया कि 'पहले मैं पादरी बनना चाहता था। लेकिन बाद में मुझे  लगा कि मैं नहीं बन सकता इसलिए इरादा बदल दिया।' आज उनका जन्मदिन था तो पत्रकारों की मौजूदगी में केक भी कटा। हमेशा मुस्कुराते रहने वाले जस्टिस कुरियन इस बात पर बहुत खुश थे कि शायद ही किसी जज का बर्थडे इतने पत्रकारों की मौजूदगी में मनाया गया हो।

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