राजस्थान: हिंदू-मुस्लिम पुरुषों ने एक-दूसरे की पत्नी को दी किडनी

नई दिल्ली(12 सितंबर): राजस्थान के जयपुर में हाल ही में हुई दो किडनी प्रत्यारोपण में सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल देखने को मिली। किडनी प्रत्यारोपण दो महिलाओं का हुआ, जिसमें हिंदू पुरुष ने मुस्लिम महिला को तथा मुस्लिम पुरुष ने हिंदू महिला को किडनी देकर उनकी जान बजाई। डॉक्टरों का दावा है कि राजस्थान में इस तरह का यह पहला मामला है।

हसनपुरा निवासी 36 वर्षीय अनीता मेहरा और अजमेरी गेट के पास रहने वाली 42 वर्षीय तस्लीम की कुछ समय से किडनी खराब थी। दोनों महिलाएं खराब किडनियों के चलते डायलिसिस कराने के लिए मोनीलेक अस्पताल आ रही थी। डॉक्टर ने दोनों को ही किडनी ट्रांसप्लांट की सलाह दी थी, लेकिन दोनों को उनके ब्लड ग्रुप का डोनर नहीं मिल रहा था। जिंदगी बचने की उम्मीद तब जगी, जब डॉक्टर ने बताया कि अनीता का ब्लड ग्रुप तस्लीम के पति अनवर अहमद से मैच कर रहा है तथा तस्लीम का ब्लड ग्रुप अनीता के पति विनोद मेहरा से मैच कर रहा था। रिपोर्ट देख अस्पताल की नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. आशुतोष सोनी ने दोनों परिजनों की काउंसलिंग करके किडनी प्रत्यारोपण की सलाह दी। और जाती और धर्म अलग अलग होने के बावजूद भी दोनों परिवार इसके लिए ख़ुशी ख़ुशी तैयार भी हो गए।

 ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. एसएल तोलानी के नेतृत्व में 8 डॉक्टरों की टीम ने ऑपरेशन किए। तस्लीम व उनके पति अनवर ने बताया कि डोनर नहीं मिलने के कारण वे परेशान थे। जब एक हिंदू भाई से किडनी मिली तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। ऐसा लगा जैसे ऊपरवाले ने ईद पर तोहफा दिया।  जहां 36 वर्षीय अनीता मेहरा को अनवर अहमद की किडनी लगाई गई वंही 42 वर्षीय तस्लीम को विनोद की किडनी लगाई गई। अनवर अहमद जहां तस्लीम के पति है तो वंही विनोद अनीता मेहरा के पति है ।जयपुर के जवाहर नगर स्थित एक निजी अस्पताल में खराब किडनियों के चलते पिछले काफी समय से अनीता और तस्लीमा का ईलाज चल रहा था और ये दोनों डायलिसिस के लिए काफी समय से अस्पताल आ रहे थे। दोनों के लिए किडनी प्रत्यारोपण की सलाह चिकित्सकों ने काफी समय से दे रखी थी लेकिन दोनों को उनके ब्लड ग्रुप के मुताबिक़ डोनर नहीं मिल रहा था  और अगर दुसरे ब्लडग्रुप का प्रत्यारोपण किया जाता तो वो काफी महंगा हो जाता। 

अच्छी बात यह रही की परेशानी झेल रहें दोनों परिवारों को उस समय नयी जिंदगी मिल गयी जब की  डॉक्टर्स ने दोनों महिलाओं के पतियों की ब्लड ग्रुप चेक करवाए। दोनों का ब्लडग्रुप एक दुसरे की पत्नियों से मैच कर रहा था। इसके बाद चिकित्सकों ने दोनों परिवारों की विशेष काउंसलिंग करी और दोनों परिवारों ने चिकित्सकों की राय। अपने परिवार और यंहा तक की धर्म गुरुओं की सहमती से इस प्रत्यारोपण के लिए हामी भर दी। अस्पताल और परिवार ने मिलकर "ह्यूमन ऑर्गन औपचारिकता एक्ट" के मुताबिक़ सभी तैयारियां कर डाली और 8 अनुभवी डॉक्टरों की टीम ने इस सफल प्रत्यारोपण को कर दिखाया। 

जाहिर है की दोनों परिवारों ने धर्म से ऊपर उठकर एक दुसरे की जिंदगी बचाने के लिए ये कदम उठाकर दुनिया को ये मैसेज देने की कोशिश की है कि हम दोनों के सभी अंग समान है तो किसी की जिंदगी बचाने के लिए धर्म का अंतर क्यों करें। इंसानियत के लिए मिसाल पेश करने वाले दोनों पतियों ने सबसे बड़े इस दान को करने के बाद अपनी ख़ुशी भी जाहिर की।