सेंसर बोर्ड ने ‘जय गंगाजल’ से ‘साला’ शब्द बीप करने को कहा, प्रकाश झा बोले- ये तो हद है

नई दिल्ली (4 जनवरी) : केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) की फिल्म में कट्स और बीप्स की मांग ने एक और जानेमाने फिल्मकार को नाराज़ कर दिया है। ये फिल्मकार हैं प्रकाश झा। उनकी अपकमिंग फिल्म जय गंगाजल को लेकर सेंसर बोर्ड ने नज़रें तिरछी की हैं। दरअसल, सेंसर बोर्ड को फिल्म में साला, घंटा जैसे शब्दों पर एतराज़ है।

यहां ये बताना दिलचस्प होगा कि निर्देशक राजकुमार हिरानी को उनकी अगली फिल्म के लिए ‘साला खड़ूस’ टाइटल रखने की सेंसर बोर्ड ने अनुमति दे दी है। लेकिन प्रकाश झा को उनकी फिल्म ‘जय गंगाजल’ में जहां भी साला शब्द इस्तेमाल हुआ है, उसे बीप करने के लिए कहा है। बता दें कि साला शब्द सेंसर बोर्ड के चीफ पहलाज निहलानी की उस विवादित फेहरिस्त में शामिल था, जिसे बॉलिवुड की हस्तियों के सख्त एतराज़ के बाद ड्रॉप कर दिया गया था।  

रिवाइज़िंग कमेटी ने फिल्म को यूए सर्टिफिकेट के लिए 11 कट्स के लिए कहा है। अगर इसे लागू किया गया तो फिल्म में 50 जगह बदलाव करने पड़ेगे। प्रकाश झा का सवाल है कि आखिर आप एक फिल्म में कितने बीप्स रख सकते हैं। प्रकाश झा ने कहा कि साला ऐसा शब्द है जो आम बोलचाल में हर दिन ना जाने कितनी बार बोला-सुना जाता है। पुलिस थीम पर बनी जय गंगाजल का परिवेश ऐसा है जहां ऐसी बोलचाल आम है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक प्रकाश झा ने कहा कि मैंने फिल्म में कहीं भी राष्ट्रविरोधी या धर्मविरोधी कुछ नहीं कहा है। मैं ज़िम्मेदार फिल्मकार हूं जो कभी किसी की भावनाओं को आहत नहीं करेगा।

झा ने तर्क दिया कि उनकी मूल फिल्म गंगाजल जब 2003 में रिलीज़ हुई थी तो बीजेपी की सरकार ही थी। तब फिल्म में हिंसा और गालियां थीं। लेकिन तब सिर्फ एक शब्द को म्यूट किया गया था और फिल्म को यूए सर्टिफिकेट दिया गया था। उस समय के सूचना और प्रसारण मंत्री ने फिल्म की तारीफ भी की थी। वो फिल्म कम से कम 300 बार टीवी पर प्रसारित की जा चुकी है। लेकिन कभी किसी ने आपत्ति नहीं की।

झा कहते हैं कि एक ओर मस्तीजादे, क्या सुपरकूल हैं हम जैसी फिल्मों पर सेंसर की कैंची नहीं चली। इन फिल्मों के ट्रेलर को ही देखकर घिन आती है। वहीं, बिहार की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म में वहां के आम बोलचाल के जुमलों से एक ऐसा शब्द हटाने की बात की गई जिससे आज के समाज में कोई परहेज नहीं है। साला कोई ऐसी गाली या कोई आपत्तिजनक शब्द नहीं है जिसे हटाने की बात की जाए।

जिस डॉयलाग को लेकर आपत्ति जताई गई है, वह इस प्रकार है। फिल्म में डीएसपी के तबादले को लेकर एक मंत्री दूसरे अधिकारी से कहता है कि अच्छा हुआ डीसीपी की जगह आईपीएस का तबादला हो गया । डीएसपी का तबादला होता तो अपना तो साला जय सियाराम होता ही, आपका भी पत्ता साफ हो जाता।

 

अब देखना है कि जानेमाने फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में सीबीएफसी के कामकाज पर नज़र रखने वाली उच्चस्तरीय जो कमेटी बनी है, उसके सक्रिय होने के बाद सेंसर बोर्ड के रवैये में क्या बदलाव आता है।