अब अंतरिक्ष में दिखेगा 'देशी' स्पेस शटल का दम

नई दिल्ली (23 मई): आज फिर हर हिंदुस्तानी का सीना 56 इंच चौड़ा हो गया। इसरो के वैज्ञानिकों ने देसी स्पेस शटल का परीक्षण किया, जो पूरी तरह से सफल रहा। अब हिंदुस्तान भी अपना स्पेस शटल अंतरिक्ष में भेज सकेगा।

श्रीहरिकोटा से जैसे ही इसरो के इस रॉकेट ने उड़ान भरी, दुनिया देखती रह गई। इस उड़ान के साथ ही हिंदुस्तानी वैज्ञानिकों ने वो कर दिखाया है, जिसे दुनिया के सिर्फ कुछ देश ही कर पाए हैं। 

हिंदुस्तान ने अपना देसी स्पेस शटल सफलतापूर्वक लॉच कर, अंतरिक्ष टेक्नॉलॉजी में अपनी ताकत का लोहा मनवाया है। इसे इस तरह से डिजाइन किया गया है कि जिसके बार-बार इस्तेमाल किया जा सके। इस देसी स्पेस शटल प्रोजेक्ट को सफल बनाने में 600 से ज्यादा इंजीनियरों की मेहनत लगी है। लॉचिंग के बाद ये स्पेश शटल धरती से करीब 70 किलोमीटर की उंचाई तक अंतरिक्ष में पहुंचा। उसके बाद इसने धरती का रूख किया और धरती के वातावरण के सबसे गर्म हिस्सों को पार कर वापस धरती के वायुमंडल में पहुंचा।

वापसी के दौरान वातावरण के बेहद उच्च तापमान से बचाए रखने के लिए, इस शटल के नीचे खास टाइल्स लगाई गई थी। जिससे लोहे को भी पिघला देने वाले तापमान से शटल को नुकसान ना पहुंचे। RLV-TD की ये हाइपरसोनिक टेस्ट फ्लाइट रही। शटल लॉन्चिंग के बाद सीधा आसमान में गया। इसकी गति आवाज से 5 गुना ज्यादा थी। 

देसी स्पेस शटल का ख्वाब हिंदुस्तान के वैज्ञानिकों ने 15 साल पहले देखा था।  इस पर काम महज 5 साल पहले ही शुरू हो सका। लांचिंग के बाद RLV-TD को बंगाल की खाड़ी की ओर मोड़ा गया। स्पेस शटल पर सैटेलाइट और राडार से नजर रखी गई। समंदर के वर्चुअल रने वे पर इसकी लैंडिंग हुई। समंदर के तट से इस रनवे को करीब 500 किमी दूर बनाया गया था। इस कामयाबी से वैज्ञानिकों में खुशी की लहर दौड़ गई है । इस अभियान पर करीब 95 करोड़ रुपये खर्च आया।

अभी तक इस तरह की तकनीक अमेरिका, रूस, फ्रांस और जापान के पास ही हैं। स्पेस तकनीक में अपनी महारत का दम भरने वाले चीन ने इसके लिए कोशिश तक नहीं की है। क्योंकि ये बेहद जटील तकनीक है, जिसमें महारत हासिल करना आसान नहीं है। 

रूस ने 1989 में ऐसा ही स्पेस शटल बनाया। रूस के शटल ने सिर्फ एक बार ही उड़ान भरी। अमेरिका ने पहला आरएलवी टीडी शटल 135 बार उड़ाया। फिलहाल, स्पेस शटल को पूरी तरह से उपयोगी बनाने में हिंदुस्तान को करीब 10 से 15 साल लगेंगे। लेकिन, स्पेस शटल की पहली सफल उड़ान ने वैज्ञानिकों के हौसले बुलंद कर दिए हैं- नई उड़ान के लिए।