Yoga Day Special: अमेरिका को 'योग' सिखाने वाले 'परमहंस योगानंद', आखिरी घड़ी में होठों पर था 'भारत'...

नई दिल्ली (20 जून): 21 जून को जब दुनिया लगातार दूसरा 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' मना रही है। ऐसे में दुनिया भर में योग को लेकर उत्साहित लोगों को परमहंस योगानंद को जरूर याद करना चाहिए। उन्होंने भारत के आखिरी तट से प्राचीन विज्ञान 'योग' को पूरी दुनिया में पहुंचाने के लिए किसी अन्य की तुलना में अद्भुत काम किया।

अगर संयुक्त राष्ट्र ने हर साल 21 जून को योग दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है। तो इसका प्राथमिक श्रेय योगानंद को जाता है। जो 1920 में अमेरिका गए और योग व ध्यान की शिक्षा दी। उन्होंने लगातार तीन दशकों तक हजारों की संख्या में अमेरिकियों को इसकी दीक्षा दी, वो भी ऐसे समय में जब योग एक अजीब शब्द माना जाता था।

योगानंद भारत में एक छोटे से दौरे के लिए केवल एक ही बार आए, जब उन्होंने वर्धा में महात्मा गांधी को क्रिया योग की दीक्षा दी। वह अपने गुरु के कहने पर वापस अमेरिका चले गए। जहां, 1952 में विचित्र परिस्थितियों में उनका निधन हो गया।

1946 में योगानंद ने अपनी प्रभावशाली आत्मकथा 'ऑटोबॉयोग्राफी ऑफ ए योगी' प्रकाशित की। बेहद कम समय में ही इसे 20वीं सदी की 10 सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक पुस्तकों में शुमार किया गया। इससे पहले किसी अन्य किताब ने योग और आध्यात्म के प्रचार के लिए शायद इतना प्रभाव नहीं डाला था। इस आत्मकथा का 21 भाषाओं में अनुवाद किया गया है। जिसकी लाखों की संख्या में प्रतियां बिक चुकी हैं।

'हिंदुस्तान टाइम्स' के मुताबिक, इस साल ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी की 70 वीं सालगिरह है। जो अभी भी आध्यात्मिक कैटेगरी में 'बेस्ट सेलर' बनी हुई है। जिसने लाखों लोगों को दुनिया भर में आध्यात्म के रास्ते पर पहुंचाया है।

योगानंद का जन्म 5 जनवरी, 1893 को एक आध्यात्मिक परिवार में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था। जन्म के समय उनका नाम मुकुंदलाल घोष रखा गया। वह 8 बच्चों में चौथे थे। उन्होंने आत्म-प्राप्ति के पथ के प्रति अपनी रुचि के बेहद कम उम्र में ही लक्षण दिखा दिए थे।

मुकुंदलाल के गुरु युक्तेश्वर गिरी ने उन्हें ग्रैजुएट होने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्हें योगानंद की पहचान दी। गुरु का परामर्श था, "एक दिन तुम पश्चिम जाओगे। यहां के लोग भारत के प्राचीन ज्ञान के प्रति ज्यादा रुचि लेंगे, अगर एक अजीब हिंदू गुरु के पास एक यूनिवर्सिटी डिग्री होगी।"

रांची में 1917 में योगदा सत्संग सोसाईटी ऑफ इंडिया (YSS) की स्थापना हुई। जिसके तीन साल बाद नौजवान योगानंद, अंतर्राष्ट्रीय धर्म संसद में हिस्सा लेने बोस्टन गए।

उनका मिशन था पूर्व और पश्चिम को आध्यात्मिक समझ के जरिए एकजुट किया जाए। जिसके लिए धर्मों की एकता पर जोर दिया जाए। 

योगानंद ने अमेरिका में काफी भ्रमण किया। उन्होंने लाखों लोगों को योग और ध्यान वार्ता के जरिए प्रभावित किया। इस तरह पश्चिम में योग की नींव पड़ी और आज इसे 'इंटरनेशनल योगा डे' के तौर पर दुनिया भर में मनाया जा रहा है।

योगानंद कर्मकांड में विश्वास नहीं करते थे। उन्होंने धर्मनिरपेक्ष भाषा का इस्तेमाल किया। इसके अलावा कभी अपने विचारों को दूसरों पर थोपा नहीं। अमेरिका में, उन्होंने भारत के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का बखान किया। इसके अलावा योग के माध्यम से संतुलित जीवन की कक्षाएं दी।

हालांकि, आखिरकार उनकी आत्मकथा ने योगानंद को आध्यात्म के क्षेत्र में वह स्थान दिया, जो आज भी बरकरार है।

7 मार्च 1952 को लॉस एंजेलिस के बिटमोर होटल के एक कार्यक्रम में योगानंद ने आखिरी बार संबोधित किया। जिसमें अमेरिका में भारत के राजदूत भी मौजूद थे। योगानंद की कही आखिरी बात आज भी याद की जाती है। उन्होंने कहा था, "मुझे गर्व है कि मैं भारत में जन्मा। मुझे गर्व है कि मेरे आध्यात्मिक भारत के प्रतिनिधि के तौर पर महान राजदूत यहां हैं। मैं आज बहुत गौरवांवित हूं।"

उन्होंने अपनी कविता 'माइ इंडिया' की कुछ पंक्तियां पढ़ीं। जिसके बाद योगानंद फर्श पर गिर गए। उनके चेहरे पर एक अलग सी मुस्कान थी। उनका निधन हो चुका था। योगानंद के आखिरी क्षण प्रत्यक्ष देखने वाले बिनय आर. सेन काफी आश्चर्यचकित थे। उन्होंने योगानंद को श्रृद्धांजलि दी। उन्होंने कहा, "योगानंद भारत में जन्मे, वह भारत के लिए जिए। आखिर में अपने होठों पर भारत के नाम के साथ वह इस दुनिया से अलविदा हुए।"

भारत सरकार ने योगानंद के सम्मान में मार्च 1977 में एक पोस्टल स्टैंप जारी किया था। हालांकि, स्वामी विवेकानंद की तरह स्कूल की किताबों में योगानंद को जगह नहीं मिली।