आंतरिक व्यापार पर विशेष जोर, अभी है 54 प्रतिशत

नई दिल्ली (31 जनवरी): वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 पेश किया। सर्वेक्षण में बताया गया है कि अखंड आर्थिक भारत के निर्माण के दौर में राजनीति, प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था तेज रफ्तार पकड़ रहे हैं। इस बढ़ते हुए आंतरिक एकीकरण को और बढ़ाने के लिए यह समय तेजी से कानूनों के कार्यान्वथयन का है।

इसमें कहा गया है कि राज्योंक के बीच आंतरिक व्यापार उच्च स्तर पर है। अन्य‍ बड़े देशों की तुलना में भारत का आंतरिक व्यापार-सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अनुपात लगभग 54 प्रतिशत है, जिस सीमा तक सांवैधानिक प्रावधान आर्थिक भारत के निर्माण को सुगम बनाते हैं उसकी चर्चा अंतिम खंड में की गई है।

अंतर राज्‍यीय व्‍यापार प्रवाह के लिए अबतक के पहले आंकलन से संकेत मिलता है कि कंपनियों के बीच सीमा पार आदान-प्रदान जीडीपी का कम से कम 54 प्रतिशत है। जिसका अर्थ है कि घरेलू व्‍यापार महत्‍वपूर्ण है। इससे ऐसा लगता है कि कम से कम भारत आंतरिक रूप से बेहतर ढंग से एकीकृत है। अधिक तकनीकी विश्‍लेषण से इसकी पुष्टि होती है और पता चलता है कि भारत में व्‍यापार लागत उसी सीमा में कम होती है जिस सीमा में अन्‍य देशों में।

- सर्वेक्षण में दर्शाया गया कि उत्‍तराखंड, हिमाचल प्रदेश और गोवा जैसे छोटे राज्‍यों में अधिक व्‍यापार होता है।

तमिलनाडु, गुजरात और महाराष्‍ट्र के विनिर्माण पावरहाउस शुद्ध निर्यातक हैं।

- इनके अलावा कृषि प्रधान हरियाणा और उत्‍तर प्रदेश भी गुरुग्राम तथा नोएडा के कारण व्‍यापारिक पावरहाउस हैं, जो दिल्‍ली के शहरी नक्‍शे का हिस्‍सा बन गए हैं।

- राज्‍यों में अंतर कंपनी व्‍यापार भी आश्‍चर्यजनक रूप से अधिक है (अंतर कंपनी का लगभग 68 प्रतिशत अंतरराज्‍यीय व्‍यापार) और कुछ हद तक इसका अंतर कंपनी व्‍यापार की तुलना में व्‍यापार लागत पर अधिक प्रभाव प्रड़ता है।

हालांकि यह निष्‍कर्ष संभवत: गलत है कि देश में वस्‍तुओं का उच्‍च व्‍यापार है। उच्‍च स्‍तर का यह व्‍यापार वर्तमान अप्रत्‍यक्ष कर प्रणाली का परिणाम हो सकता है जो कुछ महत्‍वपूर्ण मामलों में अंत: राज्‍य की तुलना में अंतरराज्‍यीय व्‍यापार का समर्थन करता है। अगर यह सही है तो जीएसटी इन विसंगतियों को दूर करने के अलावा देश में अंतरराज्‍यीय व्‍यापार को सामान्‍य बना देगा। कुछ मामलों में इससे व्‍यापार में कमी आ सकती है फिर भी अनुपालन में सुधार, प्रतिस्‍पर्धा बढ़ने और अन्‍य चैनलों के कारण कर राजस्‍व पर इसका सकारात्‍मक प्रभाव पड़ेगा।

गौरतलब है कि भारतीय संविधान में केन्‍द्र और राज्‍यों को व्‍यापार और वाणिज्‍य को नियंत्रित करने की स्‍वतंत्रता का प्रावधान है, आर्थिक भारत के निर्माण की आवश्‍यकता वास्‍तव में राज्‍यों की संप्रभुता के संरक्षण की जरूरतों के कारण दब गई है। व्‍यवहार में इन सांवैधानिक प्रावधानों पर न्‍यायालय की व्‍याख्‍या भी आर्थिक एकीकरण की तुलना में राज्‍यों की संप्रभुता की सुरक्षा के पक्ष में है।