दादा की ख्वाहिश के लिए बिहार के लड़के ने बनाई 'स्टीफन हॉकिंग वाली' व्हीलचेयर

नई दिल्ली (21 जून): अपने बुजुर्ग दादा की ख्वाहिश को पूरा करने के लिए बिहार के एक लड़के ने काबिल-ए-तारीफ काम किया है। दादा की उम्र 90 साल के करीब है। जो उम्र के इस पड़ाव पर किसी भी कीमत पर चलने फिरने और अपने रोज के कामों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहते। इसलिए उनके कहने पर लड़के ने एक ऐसी बैटरी से चलने वाली व्हील चेयर बनाई है, जो केवल आवाज के दिए कमांड से चल सकती है। 

'हिंदुस्तान टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, पटना के बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के फाइनल सेमेस्टर के स्टूडेंट आशुतोष प्रकाश ने ये व्हीलचेयर बनाई है। अपनी प्रेरणा के बारे में बताते हुए आशुतोष ने कहा, "मेरे दादा इसे बड़ा नापसंद करते हैं, कि कोई उनकी मदद की कोशिश करे, उनके रोज के कामों में हाथ बंटाए, या उनके चलते समय सहारा देने के लिए अपना हाथ बढ़ाता है। मुझे भरोसा है कि ऐसे कई लोग होंगे, मैं उनके लिए कुछ करना चाहता हू्ं।"

आशुतोष को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी में इंटर्नशिप के दौरान तीन साल पहले ये आइडिया आया। आशुतोष ने बताया कि उसके इंटर्नशिप गाइड डॉक्टर अतुल ठाकुर ने इस आइडिया को रियलाइज करने में मदद की।

इस व्हीलचेयर की तुलना जाने माने भौतिकी विशेषज्ञ स्टीफन हॉकिंग की व्हीलचेयर से की जा रही है। ये ऐसी व्हीलचेयर है, जो आवाज के कमांड से चार बेसिक मूवमेंट करती है। दांये, बांये, आगे और पीछे। ये किसी भी रुकावट या सीढ़ियों के आने पर अपने आप रुक जाती है। आशुतोष ने बताया, "ये सीढ़ियों के पास जमीन बराबर ना होने पर इसका सेंस लगा लेती है और रुक जाती है। इस तरह व्हीलचेयर इसे इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति की सुरक्षा करती है।" 

व्हीलचेयर में एक वॉइस-प्रोसेसर, कंट्रोल सिग्नल्स को एम्प्लीफाई करने के लिए माइक्रोकंट्रोलर्स, मोटर, बैटरी और माइक्रोचिप्स लगाए गए हैं। यह व्हीलचेयर 80 किलोग्राम तक के व्यक्ति के लिए उपयुक्त है। जिसकी लागत केवल 20,000 रुपए आई। आशुतोष ने कहा, "इसे इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के वजन के मुताबिक, व्हीलचेयर को और मजबूत बैटरी, मोटर जरूरत पड़ेगी, जिससे इसकी कीमत बढ़ेगी।"

दरभंगा में रहने वाले टीचर प्रमोद कुमार मिश्रा और होममेकर रेनू मिश्रा के बेटे प्रमोद कुमार मिश्रा ने इस डिजाइन को अभी ओपन-एंडेड रखा है। आशुतोष चाहता है, कि कोई आगे इसे और बेहतर बनाए। आशुतोष ने कहा कि इसका मकसद पैसे बनाना नहीं, बल्कि अपने दादा जैसे लोगों की मदद करना है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह पहली बार नहीं है जब आशुतोष ने जरूरतमंद लोगों की जिन्दगी सुधारने के लिए टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल किया है। इससे पहले आशुतोष ने एक सस्ता कृत्रिम अंग बनाया दो मस्तिष्क के सिग्नल्स पर प्रतिक्रिया करता है।