भारत की चतुर और राजनैतिक दक्ष नेता थीं इंदिरा गांधी

नई दिल्ली (31 अक्टूबर): इंदिरा गांधी की बुद्‌धि, चतुराई व राजनैतिक दक्षता का गुणगान उनके विरोधी भी करते थे। एक ऐसी महिला जो न केवल भारतीय राजनीति पर छाई रहीं बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी वह विलक्षण प्रभाव छोड़ गईं। वे देश की पहली महिला हैं जो सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहीं। उनकी दुनियाके कुशल,योग्य और राजनेताओं में होती है। इंदिरा गांधी भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार होने वाली पहली महिला लीडर भी हैं।

तीन अक्टूबर 1977 इतिहास के पन्नों में दर्ज वो दिन है जब इंदिरा के खि़लाफ एक एफआईआर दर्ज की गई थी। इस दिन आईपीएस अधिकारी एनके सिंह ने उन्हें एफआआईआर की एक प्रति दी थी जिसमें उन पर अपने सरकारी पद का दुरुपयोग करने और 1971 में चुनाव प्रचार के लिए सरकारी खर्च पर जीपों का प्रबंध करने का आरोप लगाया गया था। ये आरोप 1971 चुनाव में उनके प्रतिद्वंदी राज नारायन ने लगाया था। एनके सिंह सुबह आठ बजे इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करने के लिए उनके घर पहुंचे तो वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं में अफरा तफरी मच गयी।

राजीव और संजय गांधी एक कार में पुलिस के पीछे-पीछे चलते रहे। इंदिरा गांधी की हिरासत के लिए बड़कल झील के पास एक जगह चुनी गई थी। झील और फरीदाबाद के बीच का रेलवे फाटक बंद था। इंदिरा गांधी कार से नीचे उतरी और अपने वकील से सलाह करने की जिद करने लगीं। कुछ ही समय में इंदिरा की गिरफ्तारी की खबर जंगल में आग की तरह फैल गई।

इंदिरा की छवि देश वासियों के मन में ऐसी थी कि किसी के भी गले से ये बात उतर ही नहीं रही थी कि उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। इस बीच वहां भारी भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी और उनकी रिहाई के समर्थन में नारे लगाने लगे। इसके बाद एनके सिंह उन्हें पुरानी दिल्ली में दिल्ली पुलिस की ऑफिसर्स मेस में ले गए। इंदिरा गांधी को वह जगह ठीक लगी और उन्होंने रात भर वहीं पर आराम किया।

अगली सुबह चार अक्टूबर को उन्हें मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया तो पुलिस के लिए उनके समर्थकों की भीड़ पर काबू पाना मुश्किल हो गया। मजिस्ट्रेट ने उन पर लगे आरोपों के समर्थन में सबूतों की मांग की। उन्होंने बताया कि पिछले दिन ही उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी और सबूत अभी इकट्ठा किए जा रहे थे। मजिस्ट्रेट ने वादी पक्ष से पूछा कि तो फिर वे क्या करें। सरकार के पास कोई जवाब नहीं था। इसके बाद मजिस्ट्रेट ने इंदिरा गांधी को इस आधार पर साफ बरी कर दिया कि उनकी हिरासत के पक्ष में कोई सबूत नहीं दिया गया था।