भारत-अमेरिका की दोस्ती से 'जला भुना' चीन; कहा, 'हमें रोककर नहीं पूरा हो सकता भारत का सपना'

नई दिल्ली (8 जून): एक तरफ बुधवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी संसद में संबोधित किया। जहां उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के साथ आतंक के मुद्दों पर भारत-अमेरिका के रिश्तों को जबरदस्त तरीके से मजबूती दी। इसके अलावा राष्ट्रपति बराक ओबामा से उन्होंने सातवीं मुलाकात की। भारत की इसी तत्परता को देखते हुए अमेरिका से संबंधों के 'अभूतपूर्व स्तर' तक पहुंचने पर चीन में खलबली मच गई है। इस संदर्भ में चीन के एक सरकारी अखबार का कहना है कि भारत चीन को 'रोककर' या एक पक्ष को दूसरे के खिलाफ खड़ा करके नहीं उभर सकता।

मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी अखबार 'ग्लोबल टाइम्स' में छपे एक लेख में कहा गया है, "दो साल में अमेरिका की चार यात्राएं और राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ सात बैठकें- भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत और अमेरिका के संबंध को एक अभूतपूर्व स्तर पर ले गए हैं। दोनों देशों का आपस में जुड़ाव कैसा होगा, इस बात पर गर्मागर्म चर्चाएं शुरू हो गई हैं।" 

अखबार लिखता है, "किसी एक पक्ष का समर्थन करना या किसी दूसरे पक्ष के खिलाफ खेमेबंदी करने से भारत का उदय नहीं होगा। नई दिल्ली एक बहुआयामी कूटनीति की ओर देख रही है। अच्छा प्रदर्शन कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था देश को बहुपक्षीयता के साथ और ज्यादा आश्वस्त होने और संतुलित अंतरराष्ट्रीय संबंध बनाने की कोशिश करने के लिए कई प्रोत्साहन देगी।"

मोदी की हालिया अमेरिका यात्रा पर चीनी अखबार ने कहा, "चीन के साथ कई पहलुओं पर प्रतिद्वंद्विता के बावजूद भारत जानता है कि उसका बड़ा सपना चीन को भला बुरा कहकर या उसे रोककर हकीकत में नहीं बदल सकता। इसके बजाय, उन्हें अपने हित के लिए सहयोग को विस्तार देना चाहिए, संभावनाओं को तलाशना चाहिए और आपसी विश्वास कायम करना चाहिए। चीन भारत के लिए एक प्रतिद्वंद्वी से ज्यादा सहयोगी है। यह चीन के प्रति भारत की मौलिक समझ बनाएगा।"

'चीन को रोककर नहीं पूरा हो सकता भारत का सपना' शीर्षक से छपे लेख में कहा गया कि मोदी की यात्रा के साथ नयी दिल्ली उम्मीद कर रही है कि कई पक्षों में- विशेषकर कारोबार एवं व्यापार, सुरक्षा सहयोग और परमाणु मुद्दों पर- उपलब्धियां हासिल होंगी। अखबार ने कहा, "भूराजनीतिक परिदृश्य में आया बदलाव अमेरिका और भारत को एक दूसरे के ज्यादा करीब लाने के पीछे का बड़ा वाहक है। एशिया-प्रशांत में वाशिंगटन के पुर्नसंतुलन से अमेरिका को भारत का रणनीतिक महत्व, आर्थिक क्षमता और विचारधारा की समानता का अहसास होता है।"

लेख में कहा गया है "भारत उम्मीद करता है कि अमेरिका के साथ संबंध मजबूत करके वह विकास में लाभ ले सकता है और अपनी क्षमता के अनुरूप एक अंतरराष्ट्रीय दर्जा हासिल कर सकता है। मोदी ने भारत को शक्ति का एक वास्तविक केंद्र बनाने के सामान्य नजरिए के साथ अमेरिका के साथ अपनी बातचीत की है। वह अमेरिका के साथ एक व्यापक और बेहतर आर्थिक संबंध को बढ़ावा देने के लिए उत्सुक थे।"

इसमें कहा गया, 'उन्होंने साजोसामान आदान-प्रदान समझौता पत्र पर हस्ताक्षर की अपील की। यह एक ऐसी ऐतिहासिक संधि है, जो अमेरिका के साथ साजो सामान और रक्षा सहयोग को बढ़ावा देती है और वह भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह का सदस्य बनाने में मदद के लिए अमेरिकी समर्थन की भी उम्मीद करते हैं। यह परमाणु शक्ति केंद्र के रूप में भारत के दर्जे को ठोस रूप देने का अंतिम कदम है।'

अखबार में कहा गया कि वाशिंगटन हमेशा यह उम्मीद करता है कि चीन के उदय को संतुलित रखने के लिए भारत उसके दांए हाथ की तरह काम कर सकता है। लेकिन अब तक वाशिंगटन की गणनाओं ने सही काम नहीं किया। दक्षिण चीन सागर गश्त में शामिल होने के वाशिंगटन के निमंत्रण को ठुकराने वाली नई दिल्ली का इरादा अपने मूल सिद्धांतों- स्वतंत्रता एवं गुट निरपेक्षता से दूर जाने का नहीं है। लेख में कहा गया, "एक बड़ी शक्ति बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने की प्रक्रिया में, भारत ने हमेशा स्वतंत्र और व्यावहारिक रूख अपनाया है। दूसरी बड़ी शक्तियों के बीच संतुलन उसकी पहली और उत्कृष्ट पसंद होगी।"