देश के रखवालों को बुलेट प्रूफ जैकेट की जरूरत

वरुण सिन्हा, नई दिल्ली (26 जनवरी): सरहद पर निगेहबानी करने वाले सेना के जवानों के लिए भी पिछले कई साल से बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं खरीदा गया है। जवानों के लिए बुलेट प्रूफ जैकेट यानी रक्षा कवच खरीद की फाइल इस टेबल से उस टेबल जाती रही और जवान बिना रक्षा कवच के ही दुश्मनों से लोहा लेते रहे।

हिंदुस्तान के रखवालों को मौसम की परवाह नहीं बल्कि सरहद की रखवाली के लिए ये हंसते-हंसते अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इन जवानों के पास जैसा रक्षा कवच यानी बुलेट प्रूफ जैकेट है, वैसा सभी जवानों के पास नहीं है। जिनके सीने पर दुश्मन की गोलियों से बचानेवाला रक्षा कवच नहीं लगा है, उनकी जान हमेशा खतरे में रहती है।

आर्मी के जवानों को पिछले कई साल से बुलेट प्रूफ जैकेट का इंतजार है। संसद की एक समिति ने जवानों के लिए बुलेट प्रूफ जैकेट की खरीद में देरी पर चिंता जताते हुए रक्षा मंत्रालय को चेतावनी तक दे दी कि जवानों की जिंदगियों से न खेले। आर्मी के पास साढ़े तीन लाख से ज्यादा बुलेट प्रूफ जैकेट की कमी है। जिसकी कमी से हाल के कुछ महीनों में ही दर्जनों जवान जान गंवा चुके हैं। सेना के जवानों के लिए 1,86,138 बुलेट प्रूफ जैकेट की खरीद को मंजूरी जनवरी 2014 में ही मिल चुकी थी, लेकिन अब तक खरीद की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पायी है।

आर्मी पिछले 6 साल से बुलेट प्रूफ जैकेट की मांग कर रही है। दरअसल,  2009 में 1,86,138 जैकेट्स की मांग सेना की ओर से की गई थी, लेकिन 6 साल बीतने के बाद भी इस पर कोई फैसला नहीं किया जा सका है। 2012 में इन लाइफ जैकेट्स की मांग का आंकड़ा साढ़े तीन लाख से ऊपर पहुंच गया। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकार सेना की 2009 की मांग ही पूरा नहीं कर पाई तो नए रक्षा कवच की मांग कब पूरा करेगी? रक्षा विशेषज्ञों का साफ-साफ कहना है कि हिंदुस्तान में बने रक्षा कवच य़ानी बुलेट प्रूफ जैकेट का इस्तेमाल दुनिया के 100 से ज्यादा देश करते हैं।

ब्रिटेने, जर्मनी, स्पेन और फ्रांस जैसे बड़े देशों की सेनाएं भी हिंदुस्तान में बने बुलेट प्रूफ जैकेट पर भरोसा करती हैं। क्वालिटी के हिसाब से एक बुलेटप्रूफ जैकेट की कीमत 35 हजार रुपये से लेकर 2 लाख रुपये के बीच कुछ भी हो सकती है यानी बुलेट प्रूफ जैकेट कोई अरबों-खरबों रुपये का सौदा नहीं। फिर, हमारे जवानों को क्यों नहीं मिल रहा बुलेट प्रूफ जैकेट?