सिंधु जल समझौते को तोड़े बिना भी पाक को प्यासा मार सकता है भारत

नई दिल्ली(24 सितंबर):उरी हमले के बाद पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए भारत की तरफ से सिंधु जल समझौते पर कूटनीति की जा रही है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इशारों में ही पाकिस्तान के साथ 56 साल पुरानी इस जल संधि के जारी रखने पर सवाल उठाए हैं। 

- हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि समझौता तोड़ने जैसा अंतिम कदम उठाने की बजाय इसी समझौते में ऐसे दूसरे उपाय हैं जिनसे भारत पाक की नकेल कस सकता है। विशेषज्ञ समझौता तोड़ने के कदम को अव्यवहारिक भी ठहरा रहे हैं।

- विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के पास समझौते को तोड़ने के अलावा दूसरे विकल्प भी हैं। इसमें पश्चिमी नदियों के पानी का खुद इस्तेमाल और सिंधु जल कमिशन की बैठकों को निरस्त करने के कदम शामिल हैं। इन उपायों से भी भारत अपने पड़ोसी देश पर दबाव बना सकता है।

- इंस्टिट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज एंड अनैलेसिस (IDSA) के उत्तम सिन्हा का कहना है कि समझौते को निरस्त करना न तो व्यवहारिक है और न ही जरूरी। उन्होंने बताया, 'भारत अधिकतम कमिशन की बैठकों को निरस्त करने का कदम उठा सकता है। हालांकि ज्यादा व्यवहारिक कदम सिंधु सिस्टम की पश्चिमी नदियों के पानी का इस्तेमाल है। ऐसा करना सिंधु जल समझौते के फ्रेमवर्क के अंतर्गत ही होगा।'

- 1960 में दोनों देशों के बीच हुए सिंधु जल समझौते में छह नदियों ब्यास, रावी, सतलुज, सिंधु, चिनाब और झेलम के पानी के वितरण और इस्तेमाल करने के अधिकार शामिल हैं। इस संधि के तहत 'तीन पूर्वी नदियों' ब्यास, रावी और सतलुज के पानी का इस्तेमाल भारत बिना किसी बाधा के कर सकता है। वहीं तीन 'पश्चिमी नदियां' सिंधु, चिनाब और झेलम पाकिस्तान को आवंटित की गई हैं। हालांकि भारत इन पश्चिमी नदियों के पानी का भी इस्तेमाल अपने घरेलू कामों, सिंचाई और पनबिजली के लिए कर सकता है।