भारत की उम्मीदों पर पानी फेर सकता है अमेरिकी वीज़ा रिफॉर्म एक्ट !

नई दिल्ली (9 जून): दो अमेरिकी सांसदों ने निचले सदन में एक बिल पेश किया है। अगर ये बिल पास हो गया तो भारतीय कंपनियों के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है। यानि अगर यह बिल पास होता है तो भारतीय कंपनियां आईटी पेशेवरों को एच-1बी और एल-1 वर्क वीज़ा के तहत नौकरी नहीं दे पायेंगीं। अमेरिका स्थित बड़ी भारतीय आईटी कंपनियों की आय का ढांचा काफी हद तक अमेरिका में एच-1बी और एल-1 वीज़ा पर निर्भर रहता है। जानकार सूत्रों के अनुसार, एच-1बी और एल-1 वीज़ा रिफॉर्म एक्ट 2016 के लाए जाने से 50 से ज्यादा कर्मचारी वाली कंपनियां उन लोगों को नौकरी नहीं दे पाएंगी जो एच-1बी वीज़ा पर अमेरिका काम करने आते हैं।

जबकि ज्यादातर भारतीय कंपनियों में 50 फीसदी से ज्यादा कर्मचारी एच-1बी और एल-1 वीज़ा धारक हैं। इस बिल को लाने वाले प्रायोजक उन अमेरिकी राज्यों से हैं जहां सबसे ज्यादा भारतीय अमेरिकी रहते हैं। पेश करने वाले सीनेटर पासरेल का कहना है कि अमेरिका में ऊंची डिग्री वाले कई हाई-टेक पेशेवर तैयार हो रहे हैं लेकिन उनके पास नौकरियां नहीं हैं। विदेशी कर्मचारियों से काम करवा कर कई कंपनियां वीज़ा नीति का दुरुपयोग कर रही हैं। दरअसल,अमेरिका का एच-1बी वीज़ा के तहत अमेरिका कंपनियां उन विदेशी कर्मचारियों को काम के लिए बुला सकती हैं जो किसी खास तरह की तकनीकी विशेषज्ञता रखते हैं।

इस वीज़ा के तहत एक अमेरिकी कंपनी विदेशी कर्मचारी को छह साल तक के लिए नौकरी पर रख सकती है। अमेरिका के ग्रीन कार्ड हासिल करने की तुलना में यह वीज़ा जल्दी ही हासिल किया जा सकता है और यही वजह है कि ज्यादातर भारतीय कंपनियां अपने स्टाफ को लंबे वक्त के लिए वर्क वीज़ा के तहत अमेरिका बुला लेती है। निचले सदन में बिल पेश करने वाले सांसदों का कहना है कि इस एक्ट के आने से वीज़ा प्रोग्राम की कमियां दूर की जा सकेंगी, साथ ही इससे धोखाधड़ी के मामले भी कम होंगे। अमेरिकी कर्मचारियों के साथ वीज़ा धारकों के लिए भी काफी सुरक्षा मिलेगी। विदेशियों को नौकरियों देने के मामले में पारदर्शिता होगी और कानून का उल्लंघन करने वालों को उपयुक्त सज़ा भी मिलेगी।