कश्मीर: शांति के लिए सरकार को करना होगा यह काम, ऐसे आतंक फैला रहा है हुर्रियत

आसिफ सुहाफ, संजीव त्रिवेदी, नई दिल्ली (7 सितंबर): उत्तरी कश्मीर का कुपवाड़ा आज सुबह फिर धमाकों की आवाजों से गूंज उठा। अबतक रुटीन की शक्ल अख्तयार कर चुके उन घटनाओं की तरह, जिसमें आतंकी सेना पर घात लगाकर हमले बोलते हैं और फिर गावों में जाकर छुप जाते हैं। कभी धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर की ताजा पहचान है 'आतंक का पोस्टर boy बुरहान वानी' और उसके एनकाउंटर के बाद से उपजे उथल-पुथल में अब तक हुई 70 मौतें।

घाटी में उथल-पुथल का ये ताजा दौर थम क्यों नहीं रहा। इसको लेकर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से लेकर गृहमंत्री राजनाथ सिंह परेशान हैं। वजहें समझकर हालात पर काबू पाया जा सके इसके लिए पिछले डेढ़ महीने में गृहमंत्री राजनाथ सिंह 2 बार अकेले और एक बार प्रतिनिधिमंडल के साथ घाटी का दौरा कर चुके हैं। महबूबा दो दफे दिल्ली आकर और प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से मिलकर रणनीति को बेहतर करने पर बात कर चुकी हैं। खुद सेनाध्यक्ष आज घाटी के दौरे पर हैं, लेकिन तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा, जो जानकारियां News 24 तक पहुंची उनके अनुसार ऐसा इसलिए हैं क्योंकि आतंक के पनाहगारों ने कश्मीर में इसे दहशत और पैसे के खेल से जोड़ दिया है।

जानकारी के अनुसार ताजा व्यवस्था के तहत... - अब घाटी के हर गांव में सिलसिलेवार तरीके से 5 या 6 आतंकियों की पोस्टिंग कर दी गई हैं। - इन आतंकियों का काम गांववालों में दहशत कायम रखना है। - ये आतंकी हाथों में बंदूक लिए रोज सुबह-शाम गांव के चक्कर लगाते हैं और फरमान निकालते हैं कि हुर्रियत को छोड़ और किसी की बात नहीं माननी है। - नतीजतन आम कश्मीरी अपनी जान के डर से हुर्रियत के आगे सरेंडर कर जाता है। - फिर हुर्रियत उन्हें बताता है कि कहां security forces पर पत्थरबाजी करनी है और कहां जुलूस निकालना है, नारेबाजी करनी है।

लेकिन लोगों की तथाकथित प्रतिनिधि होने के बावजूद हुर्रियत हालात को सामान्य करने में दिलचस्पी नहीं रखती या शांति की अपील नहीं करती।

इसके पीछे की वजह है...

- सीमा पार बैठे आतंक के आका जिनके हाथों में हुर्रियत की कमान है। - ये लोग अशांति को जारी रखने के अपने एजेंडे को हुर्रियत के जरिए लागू करवाते हैं। - अपने आकाओं की बात मानना हुर्रियत के लिए मजबूरी और फायदे दोनों का सौदा है। - ऐसी ही व्यवस्था के तहत घाटी में आतंक का सिलसिला जारी है।

हालात ये हैं कि कश्मीर गए सांसदों के प्रतिनिधिमंडल से मिलने सिर्फ सैयद अली शाह गिलानी ही घर से बाहर नहीं आया। वरना चाहे वो यासीन मलिक, शब्बीर शाह या फिर मिरवेज फारूक सभी घर से निकलकर बाहर आए और बैठकर बातें की व चाय ना पिला पाने के लिए माफी मांगी। प्रतिनिधिमंडल में गए सांसदों का कहना है कि हुर्रियत नेताओं के व्यवहार में तल्खी नहीं थी, लेकिन उनपर प्रतिनिधिमंडल से नहीं मिलने का एक जबरदस्त बाहरी दबाव था।

आतंक को कायम रखने में जो सबसे अहम बात फिलाहल काम आ रही है, वो है कश्मीर में आतंक को जारी रखने के लिए हो रही जबरदस्त फंडिंग। NIA के अनुसार स्थानिय बैंकों में सिर्फ पिछले सालभर में विभिन्न खातों में विदेशों से 38 करोड़ रुपये भेजे गए। ये पैसे आने के तुरंत बाद निकाल लिए जाते हैं। हुर्रियत के नेताओं को पाकिस्तान से भी सीधी फंडिग होती रही है और आर्थिक रूप से सब के सब काफी मजबूत हो गए हैं। हुर्रियत के नेता श्रीनगर में कई मकानों के मालिक हैं, उनके कई होटल और रिसार्ट भी हैं।

इसके अलावा आतंक को पैसे के जरिए ग्लैमर में लपेट कर भी फैलाया जा रहा है। बुरहान वानी जैसे आतंकी फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया के जरिए पढ़े-लिखे युवाओं की भर्ती किया करते थे, जो जितना पढ़ा लिखा उसे उतनी बढ़िया सैलरी। यहां तक की जिन पत्थरबाजों से भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का सामना होता है, उनके भी अपने रेट तय हैं जो उन्हें पत्थर चलाने के लिए दिए जाते हैं।

ऐसा नहीं कि सुरक्षा एजेंसियों के पास ये जानकारियां नहीं हैं। कहते हैं कि पूर्व में कई बार भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने भी घाटी में गिलानी के टक्कर का नेता खड़ा करने के लिए यासीन मल्लिक और शब्बीर शाह जैसों को थोड़ी शह दी, लेकिन जमाते इस्लामी पर खासा प्रभाव रखने वाले गिलानी सबों पर भारी पड़ते आए हैं।

जाहिर है कि हुरि्यत नेताओं को काबू में किए बगैर घाटी में आतंक पर काबिज नहीं हुआ जा सकता, लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि बावजूद इसके कि हुरिर्यत नेताओं पर भारतीय दंड संहिता के दर्जनों मामले है। उनपर दर्ज किसी केस को खोला नहीं जाता। मिसाल के तौर पर हत्या से लेकर दोशद्रोह और लूट के लगभग दो दर्जन मालमे यासीन मलिक पर हैं, लेकिन अभी तक एजेंसियों ने उन्हें इन मामलों की वजह से लपेटे में नहीं लिया है।

कश्मीर में हालात सुधारने की गरज से केंद्र सरकार अब हुर्रियत पर सख्ती की सोच रही है। जानकार कहते हैं कि नई-नीति के तहत अगर आतंकियों की फंडिग पर लगाम लगा दिया जाए और इनके खिलाफ दर्ज मामले खोल दिए जाएं तो ये बैकफुट पर चले जाएंगे। उनका आंकलन है कि ऐसा करने से कश्मीरी आवाम को खास फर्क इसलिए नहीं पड़ेगा, क्योंकि अशांत घाटी में आजतक फायदा हुरिर्यत नेताओं का होता आया है और नुकसान कश्मीरी आवाम का।