मुफलिसी में हॉकी कोच, 8 अंतरराष्‍ट्रीय व सैंकड़ो़ राष्‍ट्रीय खिलाड़ी देने के बाद भी बेटी की शादी के लिए नहीं पैसे

अजीत सिंह, गोरखपुर (31 अगस्त): गोरखपुर में फर्टिलाइजर में स्‍पोर्ट्स कोटे से नौकरी पाने वाले हॉकी खिलाड़ी इमरान वर्ष 1974 में रोजी-रोटी की तलाश में जौनपुर से यहां आए तो यहीं के होकर रह गए। हॉकी के जादूगर मेजर ध्‍यान चंद और केडी सिंह बाबू के शिष्‍य रहे इमरान उन्‍हें आज भी अपना आदर्श मानते हैं।

इमरान बताते हैं कि दादा मेजर ध्‍यान चंद उनसे कहते थे कि जीवन भर हॉकी की सेवा करना और बच्‍चों को नि:शुल्‍क हॉकी सिखाना, देश के इस राष्‍ट्रीय खेल में दुनिया में पहले स्‍थान पर पहुंचाना। यही वजह है कि वह उनके आदेश का आज तक पालन कर रहे हैं। उनके लिए जीना भी हॉकी है और मरना भी हॉकी ही है। उन्होंने कहा कि जब तक सांसे चलेंगी तब तक हॉकी की सेवा करते रहेंगे।

उन्होंने फर्टिलाइजर कैम्पस में 10 मई 1987 से बच्चों को निशुल्‍क हॉकी सिखाना शुरू किया। भारतीय महिला हॉकी टीम की वाइस कैप्टन रहीं निधि खुल्‍लर, संजू ओझा, रजनी चौधरी, रीता पांडेय, प्रवीन शर्मा, सनवर अली, जनार्दन गुप्‍ता और प्रतिभा चौधरी जैसे कई दिग्गज खिलाड़ियों ने उनसे हॉकी का जादू सीखने के बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।

इस शहर और देश से जिस सम्मान की इमरान को उम्मीद थी वो नहीं मिला। हॉकी के इस जादूगर को न तो भारत सरकार ने याद रखा और न ही प्रदेश सरकार ने। साल 1974 में 30 अप्रैल को इमरान को खेल कोटे से फर्टिलाइजर में नौकरी मिल गई। हालांकि इसके पहले उनका चयन भारतीय राष्‍ट्रीय टीम में हो गया था, लेकिन उन्‍होंने नौकरी को चुना। जिंदगी और परिवार की गाड़ी चलने लगी, लेकिन 10 जून 1990 को एक हादसे के बाद फर्टिलाइजर में उत्‍पादन बंद के हो गया। वर्ष 2002 में अधिकतर कर्मचारियों को वीएसएस देकर छुटटी कर दी गई। यही से मुफलिसी का दौर शुरू हुआ जो आज तक बदस्‍तूर जारी है। फिर भी हॉकी के जादूगर ने हार नहीं मानी।

स्टिक उठाने के पीछे उनका मकसद था हॉकी की नई पौध तैयार करना। उन्हें लगा कि इस हुनर से एक दिन उन्हें भी मुकाम मिलेगा। कई हॉकी खिलाड़ियों को उन्होंने स्टिक का जादू सिखाया। 8 इंटरनेशनल और 50 नेशनल महिला और पुरुष खिलाड़ी देश को देने के बाद भी उनका किसी को ख्याल नहीं आया। भारत सरकार की ओर से मिलने वाली पेंशन 973 रुपए भी इस महंगाई के जमाने में घर खर्च के लिए ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुई।

वह घर का खर्च चलाने और बेटी की शादी के लिए घर-घर जाकर स्पोर्ट्स किट्स बेचते हैं, क्‍योंकि शादी के लिए काफी पैसा चाहिए। 62 साल के इमरान मूलत: जौनपुर जिले के अबीरगढ़ टोला थाना कोतवाली के रहने वाले हैं। इमरान और पत्नी यास्‍मीन जहां के दो बच्चे मो. आमिर और उज़्मा यास्‍मीन हैं। उन्होंने खिलाड़ियों के लिए लोअर बनाने का कारखाना शुरू किया, लेकिन पैसे के अभाव में यह भी बंद हो गया। कारखाने से 200 प्रतिदिन और 6000 रुपए महीने तक की आमदनी हो जाती थी।

इमरान की बेटी उज़्मा की शादी 7 नवंबर को है, लेकिन इमरान के खाते में महज 5 हजार रुपए ही हैं। नतीजा उन्हें बेटी की शादी की चिंता दिन-रात सता रही है। मुफ़लिसी के कारण ही उन्हें बीच में ही बेटी उज़्मा की पढाई भी छुड़वानी पड़ी थी। घर-घर किट बेचने पर उन्हें कभी 3 हजार, तो किसी महीने में एक हजार रुपए बमुश्किल कमीशन मिल पाता है। स्‍टेट लेबल का खिलाड़ी और उनका बेटा आमिर दो साल से एक प्राइवेट फर्म में 6 हजार की नौकरी करता है। इमरान को हॉकी के कई पुरस्‍कार मिले, ले‍किन आज उसकी कोई कीमत नहीं है। इसके बावजूद उन्‍हें किसी से कोई शिकायत नहीं है। वह इसे उनकी किस्‍मत मानते हैं और कहते हैं कि हॉकी के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। कई राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय खिलाडि़यों को उनके मुकाम तक पहुंचाया। यदि खेल रत्‍न और द्रोणाचार्य जैसे पुरस्‍कार के लिए नामित होता तो खुशी होती।

इमरान के शिष्‍य और उनके सहायक कोच जावेद बताते हैं कि जब तक फर्टिलाइजर चला तब तक गुरुजी किसी भी परेशानी में नहीं थे, लेकिन वर्ष 2002 में फर्टिलाइजर बंद होने के बाद से उनके मुफलिसी के दिन शुरू हो गए। आज जिस गुरु को कई पुरस्‍कार और सम्‍मान मिलने चाहिए थे, वह बेटी की शादी के लिए साइकिल पर स्‍पोर्ट्स किट रखकर घर-घर बेचने को मजबूर हैं। वहीं वर्ष 2002 से गुरु इमरान से हॉकी सीख रहे उनके शिष्‍य और नेशलन कैंप कर चुके विनोद मिश्रा बताते हैं कि यहां से कई राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर के खिलाड़ी निकल चुके हैं। इस ग्राउंड से निकलने वाले खिलाड़ी देश्‍ा के हर संस्‍थान में मिलेंगे। दोनों का कहना है कि ऐसे गुरु जिसने सैंकड़ों राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय खिलाड़ी देश को दिए हैं, उसे द्रोणाचार्य और खेल रत्‍न पुरस्‍कार मिलना तो दूर केंद्र और राज्‍य सरकार ने उनकी कोई कद्र नहीं की।

आज भी हॉकी की इस नर्सरी में छोटे-छोटे बच्‍चे हॉकी के गुर सीखते हुए मिल जाएंगे। वह भले ही उम्र में छोटे हैं, लेकिन कई प्रदेश स्‍तरीय और नेशनल प्रतियोगिताओं में हिस्‍सा ले चुके हैं। कोई तीन साल तो कोई दो साल से हॉकी गुरु इमरान से हॉकी की जादूगरी सीख रहा है। सभी नन्‍हें खिलाडि़यों का सपना है कि एक दिन नेशनल हॉकी टीम में चयनित होकर देश का मान बढ़ाए। वह अपने गुरु की इस हालत से दु:खी भी हैं, लेकिन चाहकर भी उनकी मदद नहीं कर पा रहे हैं।