दिवाली के बाद यहां खेला जाता है परंपरा के नाम पर जानलेवा खेल

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न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली ( 7 नवंबर ): दीपावली के बाद देश में परंपरा के नाम पर खतरनाक खेल आज भी जारी हैं। हर साल बड़ी तादाद में लोगों के जख्मी होने के बाद भी लोग खतरों से खेलते हैं। किसी को किसी की जान तक की परवाह नहीं। खेल में शामिल लोग खून देखकर खुश होते हैं। आस्था के नाम पर अंधविश्वास का खूनी खेल देश के कई इलाकों में खेला जाता है और इसमें शामिल लोगों की बस एक ही दुहाई होती है परंपरा...


इंदौर, मध्य प्रदेश

इंदौर के गौतमपुरा गांव में दीपावली के एक दिन बाद परंपरा के नाम पर ऐसा खेल खेला जाता है जिसे देखकर लोग सिहर उठें। एक हाथ में ढाल और दूसरे हाथ में अग्निबाण लेकर एक टीम दूसरी टीम पर हमला करती है। इसे हिंगोट युद्ध कहा जाता है। इन दो टीमों के नाम होते हैं तुर्रा और कलंगी। इसमें अगर सगा भाई भी सामने वाली टीम में होता है तो युद्ध चलने तक वो अपने भाई के लिए दुश्मन ही होता है।

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क्या है हिंगोट ?
हिंगोरिया नाम के फल को सूखा कर उसमें बारूद भरा जाता है और फिर उससे तैयार होता है हिंगोट। इस हिंगोट को जलाकर लोग एक-दूसरे पर फेंकते हैं। हर साल बड़ी तादाद में लोग आग से लड़े जाने वाले इस युद्ध में घायल होते हैं। मगर ये आज भी बदस्तूर जारी है।

इस साल भी 60 लोग इस खतरनाक लड़ाई में घायल हो गए। उसमें से एक की हालत गंभीर होने पर इंदौर रेफर किया गया। मगर लोग परंपरा के नाम पर इसे हर हाल में जारी रखने पर आमादा नजर आते हैं। लोग ये मानते हैं कि इस परंपरा का रूप अब बिगड़ चुका है। मगर इन सबके बावजूद इसे खत्म करना उन्हें मंजूर नहीं। इसी तरह देश के कई दूसरे हिस्सों में भी ऐसी खतरनाक परंपरा निभाई जाती है


धामी, हिमाचल प्रदेश

शिमला से 26 किलोमीटर दूर धामी में लोग एक-दूसरे पर पत्थर बरसा कर जश्न मनाते हैं। दीवाली के एक दिन बाद यहां हजारों लोग जुटते हैं। पत्थर जमा करते हैं और फिर एक-दूसरे पर वही पत्थर फेंकते हैं। परंपरा के नाम पर आयोजित होने वाले इस जानलेवा खेल को पत्थर खेला कहा जाता है। खास बात ये है कि बलि की परंपरा को खत्म करने के लिए इस खतरनाक परंपरा की शुरुआत हुई थी।

चोट लगने के बाद बहे खून से काली मां का तिलक किया जाता है। इस पत्थर खेला में आपपास के लोग तो जुटते ही हैं। देश-विदेश से भी लोग इसे देखने पहुंचते हैं।


उज्जैन, मध्य प्रदेश
अब मध्य प्रदेश के उज्जैन में देखिए कि किस तरह परंपरा के नाम पर किस तरह अंधविश्वास का बोलबाला है। उज्जैन से 75 किलोमीटर दूर भीडावद गांव में दीवाली के अगले दिन लोगों का जमावड़ा लगता है। विधि विधान के साथ यहां ऐसी परंपरा निभाई जाती है जिसे देखकर रोंगटे खड़े हो जाएं। यहां मन्नत पूरी होने की आस लेकर लोगों को जमीन पर मुंह के बल लिटा दिया जाता है और फिर सैकड़ों गाएं छोड़ दी जाती हैं जो उन्हें कुचलते हुए गुजरती हैं। मान्यता है कि ऐसा होने से लोगों की मुरादें पूरी होती हैं।


मन्नत मांगने वालों को दीवाली से 5 दिन पहले से ही अपना घर छोड़ मां भवानी के मंदिर में रहना पड़ता है। दीवाली के अगले दिन उन्हें गांव में घुमाया जाता है और फिर ये रस्म निभाई जाती है। इन सबके पीछे दी जाती है तो सिर्फ लंबे समय से चली आ रही परंपरा की दुहाई। जबकि इस तरह की परंपरा में जान जाने का खतरा तक रहता है। मगर आस्था के नाम पर उसे भी नजरअंदाज कर दिया जाता है।