हिन्दू-मुस्लिम महिलाओं ने एक-दूसरे के पति के लिए किया किडनी डोनेट

नई दिल्ली(25 मई): कहते हैं इंसानियत का कोई धर्म या मजहब नहीं होता। इस बात को दो महिलाओं ने सांप्रदायिक सौहार्द का अनूठा नमूना पेश कर सच साबित किया है।

- दिल्ली से सटे नोएडा में दोनों महिलाओं ने एक दूसरे के पतियों को किडनी दान में दो परिवारों की नई आस जगाई है। इन दोनों परिवार जो रिश्ता कायम हुआ है वो धर्म या मजहब से ऊपर उठकर इंसानियत का है।

- पवित्रा कहती है की मुझे खुशी है की मै अपने पति के जान बचा पाई। एक बार तो आस टूट चुकी थी। अगर इकराम भईया और राजिया बहन नहीं मिलते तो क्या होता। रजिया और मेरे किडनी देने से दोनों परिवार खुशहाल है। वही राहुल कहते की जब एक–दूसरे किडनी देने के लिए डाक्टर ने सलाह दी तो कोई नेगेटिव विचार मान में नहीं आया।  

- अपने पति की को एक साल डालिसिस कराते और किडनीदाता की तलाश करते हुए देख रज़िया भी परेशान हो जाती थी। एक बड़ी मुश्किल यह थी कि पवित्रा और रजिया पति को किडनी नहीं दे सकती थीं, क्योंकि दोनों का रक्त समूह अलग-अलग था। एक आस तब जागी जब डाक्टरों ने बताया पवित्रा, रजिया के पति को किडनी दे सकती थी, जबकि रजिया, पवित्रा के पति को किडनी देने के योग्य थी। इसके बाद दोनों परिवार ने आपस मे सलाह किया। रज़िया कहती जब सोच लिया था...ठान लिया था जो करना है सो करना है। फिर कोई डर नहीं लगा।

- ग्रेटर नोएडा निवासी 29 वर्षीय इकराम और बागपत के 36 वर्षीय राहुल किडनी की बीमारी से संबंधित परामर्श लेने 10 दिन पहले जेपी अस्पताल गए थे। जांच में पता चला कि दोनों की किडनियां पूरी तरह से खराब हैं। ऐसे में प्रत्यारोपण ही एक विकल्प है। किडनीदाता के लिए दोनों के परिवार के सदस्यों की जांच की गई, लेकिन इकराम की पत्नी रजिया और राहुल की पत्नी पवित्रा ही किडनीदाता के रूप में योग्य पाई गईं। इन दोनों के बीच एक बड़ी मुश्किल यह थी कि पवित्रा और रजिया पति को किडनी नहीं दे सकती थीं, क्योंकि दोनों का रक्त समूह अलग-अलग था। पवित्रा, रजिया के पति को किडनी दे सकती थी, जबकि रजिया, पवित्रा के पति को किडनी देने के योग्य थी। ऐसे में दोनों परिवारवालों से डॉक्टरों ने बात की। इस सलाह को दोनों परिवारवालों ने मान ली। इसके बाद दोनों मरीजों में किडनी प्रत्यारोपित की गई।