...तो क्या खत्म हो रहा है हिमालय!, आंकड़ों ने उड़ाई वैझानिकों की नींद

अधीर यादव, नई दिल्ली (27 जुलाई): हिमालय के पहाड़ों पर इस वक्त ऐसा कुछ हो रहा है जो इससे पहले कभी नहीं हुआ। ये बहुत ही असामान्य घटना है। सोचिए, अगर ग्लेशियर ही नहीं रहेंगे तो नदियों का वजूद नहीं रहेगा और अगर नदियां नहीं होंगी तो, जीवन की कल्पना करना बहुत मुश्किल है।

गोमुख ग्लेशियर के पिघलने और टूटने का सिलसिला लंबे समय से चल रहा था। जुलाई महीने की शुरुआत में ही गोमुख ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर गिर गया था जिसके बाद भागीरथी में बड़े बड़े बर्फ के टूकड़े दिखाई पड़ रहे थे। लेकिन किसे मालूम था कि ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से महीने भर के अंदर गोमुख ही गायब हो जाएगा। आपतो बता दें कि धरती पर जहां बर्फ पिघलने की तुलना में बर्फबारी ज़्यादा होती है, वहीं ग्लेशियर बनते हैं।

हिमालय क्षेत्र में कोई 18065 ग्लेशियर हैं और इनमें से कोई भी तीन किलोमीटर से कम का नहीं है। हिमालय के ग्लेशियर के बारे में ये भी गौर करने वाली बात है कि यहां साल में तीन सौ दिन, हर दिन कम-से-कम आठ घंटे तेज धूप रहती है। जाहिर है कि थोड़ी-बहुत गर्मी में ये बर्फ के पहाड़ नहीं पिघल सकते।

ग्लेशियर अपने वज़न की वजह से नीचे की ओर सरकते रहते हैं। जिस तरह नदी में पानी ढलान की ओर बहता है, वैसे ही ग्लेशियर भी नीचे की ओर खिसकते हैं। लेकिन इनकी रफ्तार बेहद धीमी होती है, 24 घंटें में बमुश्किल 4 या 5 इंच। 

हिमालय से गंगा सागर तक मिलने वाली सभी नदियों से 60 प्रतिशत जल पूरे देश को मिलता है। ये जल 5 दशकों से कम होता जा रहा है। गोमुख ग्लेशियर हर साल 3 मीटर पीछे जा रहा था।

ये वो आंकड़े हैं जो वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ा सिर दर्द बन गए हैं। वैज्ञानिकों को जो साल दर साल के हिसाब से जो आंकड़े मिल रहे हैं वो बेहद ही चैकाने वाले हैं। ग्लेशियर हर साल कभी 20 मीटर तो कभी 30 मीटर के हिसाब से पिघल रहा है तो कभी ज्यादा। हांलाकि ग्लेशियर के पिघलने की एवरेज दर करीब 17 मीटर है और हर साल ये बढ़ रहा है।

ग्लैशियर के पिघलने की दूसरी बड़ी वजह, मौसम का परिवर्तन जो कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हो रही है। वही पिछले 10 साल के आकड़ो पर अगर नजर डाले तो मौसम में भी लगातार गर्माहट आ रही है।

मौसम में बदलाव की वजह से सबसे से ज्यादा असर छोटे ग्लेशियर पर पड़ा है जो लगभग खत्म हो रहे हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि पहले की तरह अब बर्फबारी नहीं हो रही है और जो बर्फ ग्लैशियरों पर जमा है वो लगातार गर्म हो रहे मौसम की वजह से तेजी से पिघल रहे हैं.. पिछले 10 सालों में छोटे ग्लेशियर बड़ी ही तेजी से पिघल रहे हैं।

मौसम में लगातार हो रहे बदलाव और लोगों का इन इलाकों की तरफ आना ग्लैशियर के लिए बड़ा खतरा बनकर सामने आया है, इस वजह से गोमुख लगातार पीछे की तरफ खिसक रहा था।