Aarogya Health Conclave Live update: 'अब कोरोना इतना गंभीर नहीं होगा, बच्चों को वैक्सीन देने की आवश्यकता नहीं', जानें क्यों

न्यूज़ 24 की तरफ से सोमवार को आयोजित आरोग्य हेल्थ कॉनक्लेव में कई मेहमानों ने शिरकत की।

Aarogya Health Conclave Live update: अब कोरोना इतना गंभीर नहीं होगा, बच्चों को वैक्सीन देने की आवश्यकता नहीं, जानें क्यों
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नई दिल्ली: न्यूज़ 24 की तरफ से सोमवार को आयोजित आरोग्य हेल्थ कॉनक्लेव में कई मेहमानों ने शिरकत की। कोरोना महामारी और वैक्सीनेशन को लेकर एक खास सत्र में कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई, जिसके संपादित अंश यहां पेश हैं-


डॉ सुरेश कुमार, एलएनजेपी डायरेक्टर- निश्चित रूप से पिछले एक सप्ताह से काफी आंकड़े बढ़े हैं। हमने देखा है कि लोग लापरवाह हो रहे हैं, लेकिन अभी जो संक्रमण में फिर से ऊंचाई देखी गई है। जो कि चिंता का विषय है। अधिकतर लोगों ने दूसरी डोज़ छोड़ी है। इसलिए बच्चों को भी संक्रमण हो रहा है। 


डॉ संजय राय (प्रोफेसर, सेंटर फोर कम्युनिटी मेडिसिन एम्स)- पहली बात ये है कि हमें आंकड़ों पर आधारित बात करनी चाहिए, ना कि संभावना के आधार पर। ये वैक्सीन मौत के खतरे को कम करता है। मुझे ये समझ नहीं आता है कि बच्चों को वैक्सीन देने के क्या फायदे हैं। मेरे पास कोई सबूत नहीं है कि बच्चों को वैक्सीन देने का कोई फायदा है। एक टेस्ट कर के अपने पास रखना होगा, लेकिन बच्चों में मृत्युदर पहले से बहुत कम है। लेकिन वयस्कों की मृत्यु दर को वैक्सीन देकर घटाई जा सकती है। 


डॉ बीएल शेरवाल (डायरेक्टर, आरएमएल हॉस्पिटल)- वैक्सीनेशन हम बात करते हैं कि कितना प्रोटेक्ट करेगी, तो ये बिल्कुल संक्रमण से बचाव के लिए नहीं है। ये आपकी रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता को बढ़ाती है। लेकिन बच्चों को ये समझाना होगा कि उन्हें सावधानी बरतनी पड़ेगी। मामले बढ़ने थे क्योंकि दो साल बाद पाबंदियां हटी हैं। लेकिन बच्चों को तैयार करने की जरूरत।


डॉ आर के धमीजा (मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट)- कोविड के आफ्टर इफेक्ट्स और उस दौरान लोगों को जो मानसिक प्रभाव पड़ा है वो ध्यान देने लायक है। कोविड के दौरान जो लोगों को अकेला रहना पड़ा, जो डर था, उस सभी प्रभावों ने मिलकर लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाला। इसमें दोनों ही तरह के लोग हैं, जिन्हें कोविड हुआ और जिन्हें नहीं हुआ। ऐसे लोगों की काउंसलिंग के लिए हमने टेलीफोन सेवाएं चलाईं।


- पोस्ट कोविड एंजाइटी डिसऑर्डर से निपटना ज़रूरी है। हम दो तरह की महामारियों से जूझ रहे थे। एक तो कोविड था और दूसरा मानसिक स्वास्थ्य था। भारत में आर्थिक और सामाजिक तौर पर बदलाव आ रहे हैं। लोगों को मानसिक तौर पर स्वस्थ रहने के लिए अपनी सेहत का ख्याल रखना ज़रूरी है।


- डिप्रेशन का प्रिवेंशन यह है कि जैसे-जैसे मेंटल हेल्थ समस्या बढ़ती है, हम हर घंटे में एक युवा विद्यार्थी को मानसिक तनाव की वजह से आत्महत्या करनी पड़ती है। भारत में दस से पंद्रह करोड़, कम से कम लोग हैं, जिन्हें मानसिक तौर पर समस्याएं हैं। इसका एक ही उपाय है कि हम अपनी लाइफ स्टाइल चेंज करें। वॉकिंग से हमारे शरीर में बहुत ज़रूरी हार्मोन स्त्रावित होते हैं, जो दवाईयों से ज्यादा कारगर हैं। सामाजिक तौर पर लोगों से जुड़े। नई हॉबीज़ अपनाएं। म्यूजिक सीखें।




डॉ सुरेश कुमार, एलएनजेपी डायरेक्टर- दूसरी लहर में हमने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को काफी बढ़ाया है। चाहे वो ऑक्सीजन हो या बेड्स हमने दस गुना अधिक बढ़ाया है। 


मैन पॉवर पहली लहर के समय बहुत कम थी, मशीनें तो थीं। हमने पिछले दो सालों में अपने इनफ्रास्ट्रक्चर और मैन पॉवर में करीब दस गुना की बढ़ोतरी की। यही कारण था कि हमें तीसरी लहर में कोई कमी नहीं आई। यही कारण था कि हमने तीसरी लहर में मृत्यु दर में कमी देखी।


डॉ बीएल शेरवाल (डायरेक्टर, आरएमएल हॉस्पिटल)-


दिल्ली सरकार ने कोरोना से निपटने के लिए काफी संख्या में मैन पॉवर को तैयार किया और भर्ती किया। पहले हम लोग बात करते थे कि हमारे पास ट्रेन्ड और क्वालिफायड डॉक्टर होने चाहिएं, लेकिन कोविड के बाद हमने देखा कि डॉक्टर और नर्सिंग के साथ साथ मल्टीपरपज़ वर्कर्स का महत्व बहुत ज्यादा है।  इस कारण से हमने महसूस किया कि किसी वार्ड में एमटीएस का होना कितना ज़रूरी होता है। ऐसे में हमने उन्हें भी बड़े स्तर पर ट्रेन किया है।


- अगर हमारे पास चिकित्सक और नर्सों के साथ मल्टीपरपज़ वर्कर्स का ट्रेन होना बहुत ज़रूरी है।


- ट्रेन्ड स्टाफ की बदौलत हम अगली लहर से सफलतापूर्वक निपटेंगे।


डॉ संजय राय (प्रोफेसर, सेंटर फोर कम्युनिटी मेडिसिन एम्स)- 


कई बार व्यवसाय हावी हो जाता है और विज्ञान पीछे रह जाता है। हमें स्वास्थ्य को इंप्रूव करने के लिए अपनी प्राथमिकताएं देखनी होंगी। लेकिन हमें डर का माहौल बनाने की ज़रूरत नहीं है। अत्यधिक डर से मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है और मृत्युदर भी बढ़ती है। सामान्य लोगों को डरने की ज़रूरत नहीं है। जो लोग जाने-अनजाने डर को बढ़ावा दे रहे हैं, उन्हें ऐसा करने से रुकना होगा।


- कोविड वैक्सीनेशन के अलावा अन्य वैक्सीन्स का बच्चों में अच्छा प्रभाव है। हमें इन्हें प्राथमिकता देनी चाहिए।


- विकसित देश और विकासशील देशों के स्वास्थ्य में अंतर होता है। विकसित देश संक्रामक रोगों से ही जूझ रहे हैं, बाकी बीमारियों पर बड़े स्तर पर काबू पा लिया गया है। लेकिन हम दोनों मोर्चों पर जूझ रहे हैं। 


डॉ आर के धमीजा (मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट)- हमारे पास बहुत चुनौतियां हैं, हमारी जीडीपी का स्वास्थ्य पर हिस्सा सिर्फ एक फीसदी था, लेकिन विकसित देशों में यह खर्चा दस से पंद्रह प्रतिशत है, जिसे वे अपने लोगों पर खर्च करते हैं। कोविड में मानसिक स्वास्थ्य की बात करें तो हमारी वित्त मंत्री ने भारत सरकार की तरफ से एक टेलीफोन सेवा शुरू की है, जिसके लिए बड़ा बजट जारी हुआ है। हमें इस तरह की पहल की जरूरत है।


नब्बे के दशक के बाद जिला अस्पताल, जो अच्छी हालत में हुआ करते थे, बर्बादी की हालत में हैं। इसलिए हमारा सबसे बड़ा काम ये होना चाहिए कि हम जिला अस्पतालों को संभाले। ये एक प्रमुख तरीका है अपने स्वास्थ्य को सुधारने के लिए। आम आदमी के स्वास्थ्य लिए जिला अस्पताल बड़ा किरदार निभाते हैं। 


- जब तक जनता स्वास्थ्य के सुधार के लिए आगे नहीं आएगी, तब तक बड़े बदलाव नहीं देखे जाएंगे। 


डॉ बीएल शेरवाल (डायरेक्टर, आरएमएल हॉस्पिटल)-


हम देख चुके हैं कि पूरे हिंदुस्तान में हम लोग गैर संक्रामक बीमारियों पर ध्यान दे रहे थे। लेकिन कोविड के बाद परिस्थितियां बदली हैं। हमें दोनों तरह की बीमारियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। 



डॉ सुरेश कुमार, एलएनजेपी डायरेक्टर-


जीडीपी को बढ़ने के लिए लोगों का स्वस्थ रहना ज़रूरी है। इसलिए शिक्षा और स्वास्थ्य पर बड़ा निवेश करनी आवश्यकता है। गांवों में इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ाकर चिकित्सकों को वहां सेवाएं देने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।


- अभी हमारा पूरा फोकस सुपर स्पेशियलटी अस्पतालों पर है। लेकिन ऐसी बीमारियों का प्रतिशत बहुत कम है। जबकि हमें निचले स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी उतना ही ध्यान देने की ज़रूरत है। 





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डॉ आर के धमीजा (मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट)-


न्यूज़ 24 को बधाई, क्योंकि आप ने लोगों को स्वस्थ रखने के लिए एक अहम कदम उठाया है।







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