सुप्रीम कोर्ट को चिट्ठी : भड़काऊ भाषण देने वालों पर नज़र रखने के लिए पैनल बनाने का आग्रह

नई दिल्ली (5 मार्च): देश के कई पूर्व जज, जूरिस्ट्स, रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी और वैज्ञानिकों के एक समूह ने मिलकर देश के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को चिट्ठी लिखी हैं। इस चिट्ठी में भड़काऊ भाषण देने वालों पर नजर रखने के लिए सु्प्रीम कोर्ट से पैनल के गठन की गुज़ारिश की गई है।

शुक्रवार को इस समूह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को भड़काऊ भाषणों और टिप्पणियों पर स्वतः संज्ञान लेना चाहिए।

इसके साथ ही समूह ने भड़काऊ भाषण देने वालों और हाशिए पर पहुंच चुके वर्गों पर होने वालों हमलों पर निगरानी रखने के लिए एक स्थाई आयोग बनाने के लिए भी कहा है। जिससे ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।

अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक,  इस समूह ने राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश को एक चिट्ठी लिखी है। जिसमें प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरपर्सन जस्टिस पीबी सावंत, पूर्व जज जस्टिस होसबत सुरेश, बीजी कोलसे पाटिल, पूर्व-पुलिस पदाधिकारी जूलियो रिबरो, वरिष्ठ वकील इकबाल चगला, जनक द्वारकादास, वरिष्ठ पत्रकार अनिल धरकार, साइरस गुजदेर शामिल हैं। समूह ने चिट्ठी में उन बयानों का भी जिक्र किया है, जिनकी वजह से पूर्व में विवाद पैदा हो चुका है।

चिट्ठी में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बयान का भी जिक्र है। जिसमें उन्होंने "भाजपा के बिहार में हारने पर पाकिस्तान में पठाखे फोड़ने" की बात कही थी। इसके अलावा, विदेश मामलों के राज्यमंत्री वीके सिंह के फरीदाबाद में दो दलित बच्चों की हत्या के मामले में प्रतिक्रिया में "कुत्ते" का ज़िक्र करने को भी शामिल किया गया है। इसके अलावा साध्वी निरंजन ज्योति के दिल्ली चुनावों में "रामज़ादा और ह...ज़ादा" टिप्पणी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के अगस्त 2014 में वीएचपी की स्वर्ण जयंती के मौके पर हिंदुत्व को "राष्ट्रीय पहचान" बताने को भी शामिल किया गया है। 

समूह ने भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ के "लव जिहाद" पर दिए बयान, साक्षी महाराज के "मदरसों को आतंकियों का ठिकाना" कहना, संसदीय मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के टीवी डिबेट में "बीफ खाने वालों को पाकिस्तान जाने" का बयान, मानव संसाधन राज्यमंत्री राम शंकर कठेरिया के आरएसएस की बैठक में मुस्लिमों को लेकर चेतावनी देने को भी शामिल किया गया है।

इस अपील में कहा गया है कि "भाजपा और इसके प्रतिनिधि केंद्र और स्थानीय स्तर पर खतरनाक भावनाएं भड़का रहे हैं। जो कि कुछ और नहीं बल्कि हिंसा को बढ़ावा देना है"। चिट्ठी में कहा गया है कि "भड़काऊ बयान सभी भारतीयों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि वह संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करने के लिए दिशा-निर्देश जारी करें।"

अपील में यह भी मांग की गई है कि विधायक, सांसद और मंत्रियों को संवैधानिक कर्तव्यों का उल्लंघन करने पर अनुच्छेद 51ए(ई) के तहत सजा दी जानी चाहिए। जिससे समरसता और आम भाईचारे की भावना को भारत के लोगों के बीच प्रसारित किया जा सके। जो धार्मिक विविधता के लिए जरूरी है।

अपील में कहा गया है कि इनका उल्लंघन करने पर ऐसे लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए (राष्ट्रद्रोह), 153 ए,बी (विभिन्न समूहों में धर्म, नस्ल आदि के आधार पर वैमनस्य फैलाना) 293, 295 ए (जानबूझकर दुर्भावनापूर्ण कृत्य करना, जिससे धर्म और धार्मिक आस्था का अपमान कर किसी वर्ग विशेष की धार्मिक भावनाएं भड़कें) और धारा 505 (सार्वजनिक गलती के बयान देना) का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। 

चिट्ठी में कहा गया, "हम माननीय सुप्रीम कोर्ट से अपील करते हैं कि वे एक स्थाई आयोग का गठन और उसे कार्यान्वयन में लाने के लिए कदम उठाएं। जिसे ऐसे सभी मामलों पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त किया जाए।"