आम आदमी को जेटली के बजट से हुई निराशा, उम्मीदों पर फेरा पानी

नई दिल्ली(2 फरवरी): वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बुधवार को आम बजट पेश किया। सरकार जहां बजट की तारीफ कर रही है वहीं विपक्ष इसपर निशाना साध रहा है। लेकिन उन लोगों का क्या जो इस बजट को बड़ी उम्मीदों के साथ देख रहे थे। हर साल जब बजट पेश होता है तो देश की जनता बजट का खासा इंतजार करती है, क्योंकि उसकी जेब से जुड़ा सवाल जो है। इस साल के आम बजट से तो देश की जनता को और भी उम्मीदें थीं। क्योंकि नोटबंदी के दौरान 50 दिन जनता ने सरकार की नीति को सफल बनाने के लिए बड़ा सहयोग किया। लोग खतारों में लगकर अपने पैसे निकालें। कई जानें भी गईं। लेकिन आखिर में सवाल उठता है कि देश की जनता को इस बजट से क्या मिला।

बजट ऐलान से पहले उम्मीद की जा रही थी कि सरकार गरीबों के लिए बड़ा ऐलान कर सकती है। गरीबों के लिए बेहतर जिंदगी सुनिश्चित करने के लिए इकनॉमिक सर्वे 2016-17 में यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) का प्रस्ताव किया गया था।  

क्या है यूनिवर्सल बेसिक इनकम

आदर्श रूप में यूनिवर्सल बेसिक इनकम की स्कीम ऐसी योजना होती है, जिसमें कोई शर्त नहीं रखी जाती है और सभी लोगों को पेमेंट किया जाता है। इसके तहत हर नागरिक को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए बुनियादी इनकम का अधिकार होना चाहिए।

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मंगलवार को संसद में 'आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17' पेश किया। इसमें 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' की जोरदार वकालत की गई। महात्मा गांधी के विचार- 'हर आंख से प्रत्येक आंसू पोंछने' का हवाला देते हुए इसमें कहा गया है कि बेसिक इनकम एक ऐसा शक्तिशाली विचार है जिस पर गंभीर विचार विमर्श करने का वक्त आ गया है।

मा‌र्क्सवादियों, बाजार के मसीहा, भौतिकवादियों, व्यवहारवािदयों से बेहतर ढंग से महात्मा गांधी ने इस बात को समझा। अब तक गरीबी दूर करने के लिए जिन कार्यक्रमों की शुरुआत की गई वे सफल नहीं रहे। गरीबी उन्मूलन के मौजूदा सरकारी कार्यक्रमों में भ्रष्टाचार, त्रुटिपूर्ण आवंटन और गरीबों को वंचित रखने जैसी खामियां हैं जिसके चलते ही सरकार गरीबों को बेसिक इनकम देने पर विचार कर रही है। जिस समय देश आजाद हुआ था उस समय तीन चौथाई परिवार गरीबी रेखा से नीचे थे जो 2011-12 में घटकर 22 फीसद रह गए लेकिन हर आंख से आंसू पोंछने के लिए अब भी काफी कुछ करना बाकी है।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि अगर हर साल प्रति व्यक्ति 12000 रुपये की बेसिक इनकम प्रदान की जाती है तो इससे देश में गरीबी बिल्कुल खत्म हो जाएगी। इस पर राष्ट्रीय जीडीपी के 4 से 5 फीसद के बराबर खर्च आएगा। फिलहाल सरकार मध्यम वर्ग को खाद्य, पेट्रोलियम और खाद सब्सिडी के रूप में जीडीपी के करीब 3 फीसद के बराबर खर्च करती है।

सर्वे में कहा गया है बेसिक इनकम के दायरे से आबादी के एक चौथाई धनाढ्य वर्ग को बाहर रखना होगा और इसे लागू करने के लिए जैम (जन धन के बैंक खाते, आधार और मोबाइल) की आवश्यकता होगी। साथ ही इस पर होने वाले खर्च को वहन करने के संबंध में केंद्र और राज्यों को विचार विमर्श करना होगा। समीक्षा में यह आकलन भी किया गया है कि अगर हर साल प्रति व्यक्ति को करीब 12 हजार रुपये बेसिक इनकम दी जाती है तो इससे गरीबी लगभग खत्म होकर मात्र 0.5 फीसद रह जाएगी।

बेसिक इनकम के फायदे गिनाते हुए सर्वेक्षण में कहा गया है कि इससे न सिर्फ गरीबी खत्म होगी बल्कि इससे गरीबों को लक्षित करते हुए बेहतर ढंग से कार्यक्रम चलाया जा सकेगा। इससे अचानक लगने वाले झटकों से भी बचा जा सकेगा। साथ ही इससे वित्तीय समावेशन बढ़ेगा और मनोवैज्ञानिक लाभ होंगे। समीक्षा में इस योजना को लागू करने में आने वाली चुनौतियों का जिक्र भी किया गया है। बेसिक इनकम योजना से सरकारी योजनाओं की लीकेज भी रुक सकेगी।