आग में तपकर ऐसे तैयार होते हैं एयरफोर्स कमांडो, ट्रेनिंग ऐसी कि आधे पहले ही लौट जाते हैं घर

पठानकोट (2 जनवरी): पंजाब के पठानकोट में हुए आतंकी हमले में एयरफोर्स का एक गरुड़ कमांडो भी शहीद हो गया है। एयरफोर्स के ये गरुड़ कमांडो बेहद ढाई साल की कड़ी ट्रेनिंग के बाद तैयार होते हैं। ये इतने चुस्त होते हैं कि दुश्मन को पलक झपकाने का भी मौका नहीं देते।

आसमान से ऊंचा हौसला, जमीन हिला देने की ताकत और पानी के अंदर से वार करने की क्षमता रखने वाले ये कमांडो सिर्फ अपनों की हिफाजत ही नहीं करते बल्कि दुश्मन को घर में घुस कर मारने में सक्षम हैं।

ढाई साल की कड़ी ट्रेनिंग देश में करीब 2000 गरुड़ कमांडो हैं। इनकी ट्रेनिंग इतनी कड़ी होती है कि इसमें भाग लेने वाले आधे जवान तो ट्रेनिंग पूरी होने से पहले ही छोड़कर चले जाते हैं।

ऐसे होती है ट्रेनिंग > ट्रेनिंग के दौरान इन्हें उफनती नदियों और आग से गुजरना, बिना सहारे पहाड़ पर चढ़ना पड़ता है। > भारी बोझ के साथ कई किमी की दौड़ और घने जंगलों में रात गुजारना भी इनकी ट्रेनिंग का हिस्सा है। > अत्याधुनिक हथियारों से लैस इस फोर्स को हवाई क्षेत्र में हमला करने, दुश्मन की टोह लेने, हवाई आक्रमण करने, स्पेशल कॉम्बैट और रेस्क्यू ऑपरेशन्स के लिए खास तौर पर तैयार किया जाता है।

गरुड़ कैसे करते हैं दुश्मन का खात्मा > इनके पास होती है नंबर थ्री टेलिस्कॉपिक गन। इससे रात में भी निशाना लगाया जा सकता है। > ये जवान पोर्टेबल लेजर डेजिग्नेशन सिस्टम से निशाना साधते हैं। > पोर्टेबल लेजर डेजिग्नेशन सिस्टम एक दूरबीन का काम करता है, जो फाइटर प्लेन से जुड़ा होता है। इसके द्वारा कमांडो अपने दुश्मन को जमीन पर 20 किमी तक देख सकता है। > गरुड़ के इस्तेमाल के लिए हथियार खास तौर पर इजराइल से मंगाए जाते हैं।