गांव-गांव तक पहुंचेगी 'गंगा रही पुकार'

नई दिल्ली (28 अगस्त): गंगा में बढ़ते प्रदूषण के प्रति जागरूक करने लिए सरकार 'गंगा रही पुकार' नामक पुस्तक गांव-गांव तक पहुंचाने की तैयारी में है। यह पुस्तक राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के लिए लिखी गई है। गंगा किनारे बसे सभी गावों में लोक शिक्षा केंद्रों के पुस्तकालयों में यह पुस्तक उपलब्ध रहेगी। पुस्तक रोचक और सरल भाषा में लिखी गई है। कहानियों, कविताओं और नाटक के माध्यम से पर्यावरण एवं गंगा की स्वच्छता जैसी गंभीर विषय पर ग्रामीणों की समझ बनाएगी।

पुस्तक में कुल 15 पाठ हैं। पहले पाठ 'मैं गंगा हूं' में गंगा की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है। पाठ-4 में गंगाजल की विशेषताओं की चर्चा हैं। वैज्ञानिक हैनवरी हैकिंस, डॉक्टर डेरेल और लेखक मार्क ट्वेन के हवाले से बताया गया है कि गंगा जल में कीटाणुओं को मारने की क्षमता है। अगले पाठ में गंगा तट के तीर्थ स्थानों के महत्व के क्रम में वाराणसी की सांस्कृतिक और धार्मिक विशेषताओं की चर्चा है। इसके अलावा गंगा किनारे लगने वाले मेले जैसे कुंभ, वाराणसी का गंगा महोत्सव, गंगा दशहरा, सोनपुर का मेला, कांवर मेला, सोनपुर का मेला, मनेर शरीफ आदि का जिक्र है। गंगा के पालनहारी रुप पर प्रकाश डाला गया है। गंगा के माध्यम से कैस-कैसे नए रोजगार पैदा होंगे? इसके बारे में भी बताया गया है। जल परिवहन को बढ़ावा देने वाले प्रयासों की जानकारी है।

प्रदूषण क्यों और कैसे गंगा में प्रदूषण क्यों और कैसे बढ़ रहा है? यह जानकारी पाठ-8 में सरल तरीके से दी गई है। यह बताया गया है कि शहरों की गंदगी, गांव की गंदगी, औद्योगिक कचरे, धार्मिक कारण और अन्य कारणों सें गंगा प्रदूषित हो रही हैं।

संरक्षण और कानून गंगा एवं कानून' नामक नाटक के माध्यम से यह बताया गया है कि जल प्रदूषण फैलाने वाले के खिलाफ क्या कार्रवाई हो सकती है। जल (प्रदूषण पर रोक एवं प्रतिबंध) अधिनियम 1974 और प्रदूषण रोकने के उपायों की भी चर्चा है।

खुद से पूछे सवाल पाठ-13 में कुछ सवाल उठाए गए हैं जो लोगों को उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराते हैं। जैसे, क्या हमने घर में शौचालय बनवाया है? घर का गंदा पानी और गंदगी गंगा में तो नहीं मिल रही है? क्या हम गंगा किनारे कूड़ा-कचरा, पॉलीथिन, जूठन यो हीं फेंक देते हैं? क्या हमने अपनी तरफ से गंगा साफ करने की कोशिश की? आदि।

कुछ कोशिशें ये भी इस पाठ में पर्यावरण संरक्षण के लिए हो रहे प्रयासों की जानकारी है। जैसे, वाराणसी में मंदिर के पुराने फूलों का इस्तेमाल रंग और खाद बनाने में हो रहा है। इसी प्रकार का प्रयास लखनऊ में भी चल रहा है।