कभी प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे एनडी तिवारी, ऐसे पलट गई बाजी

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली ( 18 अक्टूबर ): उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे एनडी तिवारी का निधन हो गया है। उन्होंने दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स हॉस्पिटल में गुरुवार को अंतिम सांस ली। एनडी तिवारी का निधन उनके जन्मदिन के दिन हुआ है।  बता दें कि वह 93 साल के थे। नारायण दत्त तिवारी का जन्म 18 अक्टूबर 1925 को नैनीताल के बलूती गांव में हुआ था। उनके पिता पूर्णानंद तिवारी वन विभाग में अफसर थे। उन्होंने असहयोग आंदोलन के दौरान नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। दो राज्यों के मुख्यमंत्री रहे एनडी तिवारी कभी पीएम पद के दावेदार थे, लेकिन उनकी हार की वजह से काहनी पलट गई।

दरअसल 1991 के लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान 21 मई 1991 को श्रीपेराम्बुदूर में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की बम विस्फोट में हत्या हो जाने के बाद पूरे देश में कांग्रेस के प्रति भारी सहानुभूति उमड़ पड़ी थी और कांग्रेस भारी बहुमत से चुनाव जीती भी। लेकिन संयोग रहा कि तत्कालीन नैनीताल बहेड़ी लोकसभा सीट पर नैनीताल जिले की सभी विधानसभा सीटों पर आगे रहने के बावजूद अपने ही गढ़ रहे बहेड़ी से एनडी तिवारी पिछड़ गए और 800 वोट से बलराज पासी से चुनाव हार गए थे।

राजीव गांधी की हत्या और गांधी परिवार से कोई दावेदार न होने के कारण इस बार कांग्रेस से लाल बहादुर शास्त्री के बाद एक बार फिर किसी गैर गांधी का पीएम बनना तय था और इसके लिए तिवारी का नाम उनकी योग्यता, व्यवहार और सर्व स्वीकार्यता के चलते सुनिश्चित माना जा रहा था। लेकिन उनके चुनाव हार जाने के कारण वह इस दौड़ में शामिल तक न हो पाए और पीवी नारसिम्हा राव अप्रत्याशित रूप से प्रधानमंत्री बन गए।
 

एनडी तिवारी का लंबा राजनीतिक इतिहास रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के वक्त तिवारी ने भी आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया था। 1942 में वे जेल भी गए थे। खास बात यह थी कि वे नैनीताल जेल में बंद किए थे जहां उनके पिता पूर्णानंद तिवारी पहले से ही बंद थे। आजादी के वक्त तिवारी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे।

एनडी तिवारी का अधिकांश राजनीतिक जीवन कांग्रेस के साथ रहा जहां वे संगठन से लेकर सरकारों में महत्त्वपूर्ण भूमिकाओं में रहे। इलाहाबाद छात्र संघ के पहले अध्यक्ष से लेकर केंद्र में योजना आयोग के उपाध्यक्ष से लेकर, उद्योग, वाणिज्य पेट्रोलियम, और वित्त मंत्री के रूप में तिवारी ने काम किया।

नारायण दत्त तिवारी की राजनीति में एंट्री स्वतंत्रता आंदोलन के जरिए हुई थी। एनडी तिवारी को अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में चिट्ठियां लिखने की वजह से वर्ष 1942 में गिरफ्तार कर लिया गया था, जिसके 15 महीने बाद वह रिहा हुए। 1947 में आजादी के साल ही वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए। तिवारी की राजनीतिक एंट्री इसी के साथ शुरू हुई थी।

देश आजाद हुआ और एनडी तिवारी उत्तर प्रदेश में 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में नैनीताल से प्रजा समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े। यूपी का पहला चुनाव था और नारायण दत्त तिवारी के हाथों में वोटों की गिनती के साथ ही जीत का झंडा फहरा रहा था। इसके बाद 1957 में उन्होंने नैनीताल से मुकाबला जीता और विधानसभा में विपक्ष के नेता बन गए। बढ़ते सियासी कद के साथ 1963 में नारायण दत्त तिवारी ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। काशीपुर से मुकाबला जीता और यूपी सरकार में मंत्री के पद पर काबिज हो गए। एनडी तिवारी 1969 से 1971 के बीच भारतीय युवा कांग्रेस के पहले अध्यक्ष के तौर पर काम करते रहे।

नारायण दत्त तिवारी उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री बने। हालांकि, तीनों बार उनका कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा। वह 1976-77 फिर 1985, जिसके बाद 1988 से 1989 तक यूपी के मुखिया रहे। उत्तराखंड में एनडी तिवारी ने मुख्यमंत्री के रूप में (2002-2007) अपना कार्यकाल पूरा किया। राजनीतिक सफर में उन्हें 1979 से 1980 के बीच चौधरी चरण सिंह की सरकार में भी अहम पद संभालने का मौका मिला। इस दौरान वह वित्त और संसदीय कार्यमंत्री रहे। इसके बाद 1980 में योजना आयोग का उन्हें डेप्युटी चेयरमैन बना दिया गया।

उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने वाले नारायण दत्त तिवारी ने 1954 में सुशीला सनवाल से शादी की थी। सुशीला के निधन के बाद 14 मई 2014 को एनडी तिवारी ने 89 साल की उम्र में उज्जवला शर्मा शादी की।

वर्ष 2017 में एनडी तिवारी एकबार फिर से राजनीति में संभावनाएं तलाशने भारतीय जनता पार्टी के पास पहुंचे। 18 जनवरी 2017 को बीजेपी जॉइन करने की खबरें उड़ीं तो सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे। बाद में बीजेपी ने सफाई दी कि एनडी तिवारी को बीजेपी में शामिल नहीं किया गया।