देश में सबसे पहले आधार कार्ड पाने वाली महिला का गांव 'कैशलेस'

नई दिल्ली ( 29 दिसंबर ) पुणे से करीब 47 किलोमीटर की दूरी पर दूरदराज इलाके गांव तेंभली में रहने वाली रंजना आधार कार्ड पाने वाली देश पहली महिला हैं। उनके घर में न तो रसोई गैस है, न बिजली। और तो और, नोटबंदी के बाद उन्हें काम नहीं मिल रहा।आधार कार्ड उनकी और उनके जैसे लोगों की जिंदगी आसान बनाने और बैंकिंग व फाइनेंस से जुड़ी सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से बनवाए गए थे, लेकिन रंजना कहती हैं, 'जीना मुश्किल हो गया है, मुझे लगता है सरकारें गरीब लोगों को सिर्फ राजनीति में इस्तेमाल करती हैं और असल में अमीरों के लिए काम करती हैं।' रंजना दिहाड़ी मजदूर हैं और गांव के मेले में खिलौने बेचती हैं। काम मिलना उनके लिए मुश्किल हो रहा है, क्योंकि किसान कहते हैं उन्हें बैंकों से कैश नहीं मिल रहा और उन्हें काम नहीं दे सकते। वह कहती हैं, 'मैं सारंगखेड़ा जाकर खिलौनों की दुकान लगाना चाहती थी, लेकिन नहीं जा पाई क्योंकि मेरे पास जाने के पैसे नहीं हैं।'रंजना को देश का पहला आधार कार्ड मिलने के बाद उनका गांव सुर्खियों में आ गया था। रंजना से मोदी सरकार की नोटबंदी के फैसले पर प्रतिक्रिया मांगने पर वह थकान भरी मुस्कान के साथ कहती हैं, 'हम तो पहले ही कैशलेस हैं।' नोटबंदी के बाद गांव में कोई नोट जमा करने के लिए लाइनों में नहीं लगा, उनके पास 500-1000 के नोट बदलने या जमा करने के लिए हैं ही नहीं। यहां ज्यादातर लेन-देन कैश में होते हैं और वह भी 50-100 के नोटों में।अपने पल्लू से फोटो फ्रेम को पोंछते हुए रंजना कहती हैं, '2010 में नेताओं ने मुझे और गांव के कई लोगों को आधार कार्ड थमाया, तस्वीरें खिंचवाईं और चले गए। उसके बाद किसी ने हमारी सुध नहीं ली। मेरा बिजली का मीटर निकाल लिया गया और  आधार कार्ड से लिंक किया गया बैंक खाता खाली पड़ा है, अब तक उसमें सब्सिडी का एक पैसा नहीं आया है। पहले की सरकार ने हमें ये बिना काम का आधार कार्ड थमाया और मौजूदा सरकार ने नोटबंदी कर हमसे हमारी रोजी-रोटी छीन ली।'फोटो फ्रेम में रंजना कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी के साथ दिख रही हैं। उस समय मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे जब गांव में आधार कार्ड प्रॉजेक्ट लॉन्च किया गया था