राष्ट्रपति से भी अधिक कमाता है एफसीआई का मज़दूर

नई दिल्ली (9 जनवरी) भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) में कुछ मजदूरों (पल्लेदारों) का वेतन जानकर दंग रह जाएंगे आप। क्या आप विश्वास करेंगे कि इन्हें राष्ट्रपति से भी अधिक वेतन मिल रहा है। एक महीने में इन्हें साढ़े चार लाख रुपए तक मजूदरी मिलने की रिपोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट का भी ध्यान खींचा है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि इस गड़बड़ी को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

वरिष्ठ बीजेपी नेता शांता कुमार की अध्यक्षता वाली एक उच्च स्तरीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस गड़बड़ी की जानकारी दी है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर की अध्यक्षता वाली बेंच एफसीआई वर्कर्स यूनियन की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी जो बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के आदेश के ख़िलाफ़ दायर की गई थी। हाईकोर्ट ने उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट के आधार पर केंद्र के लिए कुछ निर्देश दिए थे।  

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफसीआई को सालाना 1800 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है। जबकि इसके ‘विभागीय श्रमिक’ अपने नाम पर दूसरों को काम कराने में लगे हैं। उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट से स्पष्ट है। यहां तक कि वरिष्ठ भाजपा नेता शांता कुमार की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 370 श्रमिकों को प्रति माह करीब 4.5-4.5 लाख रुपये का वेतन मिल रहा है। जितना भुगतान किए जाना चाहिए, यह उससे 1800 करोड़ रुपये अधिक है पर आपको ठेके पर श्रमिक रखने की छूट नहीं है। कैसे एक श्रमिक द्वारा प्रतिमाह 4.5 लाख रुपये की कमाई की जा सकती है।' इस पीठ में न्यायमूर्ति ए.के. सिकरी और न्यायमूर्ति आर. भानुमति भी शामिल थे। पीठ ने कहा, 'कैसे एक श्रमिक महीने में 4.5 लाख रुपये कमा सकता है। वह श्रमिक है या ठेकेदार?। आपकी (विभागीय श्रमिकों) पगार आज भारत के राष्ट्रपति की पगार से भी अधिक है।' एफसीआई के वकील ने कहा कि विभागीय कर्मचारियों को एक महीने में करीब 1.1 लाख रुपये कमाने के लिए विभिन्न प्रोत्साहन मिलते हैं। इस पर पीठ ने कहा, 'ये प्रोत्साहन योजनाएं क्या हैं। अपने नाम पर दूसरों को काम पर रखने का आरोप है। यह एक तरह से काम को ठेके पर देना है।'