'बेटे के 18 साल के होने पर उसका खर्चा देना पैरेंट का उत्तरदायित्व नहीं'

अहमदाबाद (20 मार्च): गुजरात हाईकोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि एक पैरेंट अपने बेटे की देखभाल के लिए खर्चा देने के लिए तभी तक उत्तरदायी है, जब तक कि वह 18 साल का नहीं होता और कमाई शुरू नहीं कर देता।

हाईकोर्ट ने कहा कि पैरेंट, 18 साल की होने के बाद भी अपनी अविवाहित बेटी की देखभाल के लिए उत्तरदायी है। इसके अलावा उसकी शादी के लिए खर्च करने के लिए भी। हालांकि, यही प्रावधान बेटे पर लागू नहीं होता। सीआरपीसी की धारा 125 के प्रावधानों के तहत, एक पिता या माता बेटे को 18 साल का होने के बाद खर्चा देने के लिए जिम्मेदार नहीं है, अगर वह शारीरिक या मानसिक रूप से अस्वस्थ नहीं है।

यह मामला एक तलाक याचिका के संदर्भ में था। जिसमें दिनेश ओझा नाम के डॉक्टर और उनकी पत्नी नीता शामिल हैं। जो कि वीसनगर में प्रैक्टिस करते हैं। पत्नी को 2006 में घर से निकाल दिया गया था। जिसके बाद पत्नी ने सैटेलाइट पुलिस में 2006 को एफआईआर दर्ज कराई थी। दूसरी तरफ डॉक्टर ने महसेना में तलाक याचिका दायर की थी। पत्नी ने अहमदाबाद फैमिली कोर्ट में मेंटीनेंस की मांग की। कोर्ट ने डॉक्टर को पत्नी और बेटे को खर्चा देने के लिए कहा।

याचिका के दूसरे राउंड में, कोर्ट ने रकम को बढ़ाकर डॉक्टर से कहा कि वह बेटे का खर्चा तब तक दें, जब तक कि वह 18 साल का नहीं हो जाता। पिता ने अक्टूबर 2013 में बेटे के 18 साल के होने के बाद, पैसे देना बंद कर दिया। पत्नी ने इसके खिलाफ फैमिली कोर्ट में गुहार लगाई। फैमिली कोर्ट ने उसे हाईकोर्ट में स्पष्टीकरण के लिए जाने के लिए कहा कि क्या पिता को बेटे के 18 साल के होने के बाद भी पैसे देने चाहिए? कोर्ट ने डॉक्टर को कोर्ट में 78,000 रुपए के एरियर्स भी जमा करने के लिए कहा। 

पत्नी हाईकोर्ट में गई। जहां वकील ने दलील दी कि पिता बेटे के कमाई शुरू करने तक उसका खर्चा देने के लिए उत्तरदायी है। डॉक्टर के वकील ने तर्क दिया कि कानून इस पहलू पर साफ है कि बेटे को तभी तक खर्चा दिया जाएगा, जब तक वह 18 साल का नहीं हो जाता। केस की सुनवाई के बाद जस्टिस जेबी पर्दीवाला ने फैसला दिया कि वह बेटियों के लिए बनाए गए प्रावधानों को बेटे के लिए स्वीकार नहीं कर सकता। उन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश का हवाला दिया। जिसमें कहा गया कि यह हर पिता की नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है कि वह अपने बच्चों को उचित शिक्षा, संस्कृति दिलाए, ना केवल अपने बच्चों के तौर पर बल्कि भविष्य में देश के एक नागरिक के तौर पर। लेकिन, कोई भी कानून एक पैरेंट के लिए यह अनिवार्य नहीं करता कि वह अपने बेटे के 18 साल के होने के बाद उसका खर्चा दे। ऐसे में पिता अपने बेटे को खर्चा देने से मना कर सकता है।