मजबूर किसान की बेटी की खुदकुशी, आखिरी खत पढ़कर रो उठेगा आप...

नितिन बनसोडे, लातूर (15 अप्रैल): कर्ज से कंगाल होते किसानों की बेबसी उनके घरों को तबाह कर रही है। एक ऐसी ही तबाही की कहानी लातूर से आई है जिसे जानकर आपकी रूप कांप जाएगी। आप शर्मिंदा होंगे देश के किसानों की हालत और उऩकी तकलीफें देखकर।


एक किसान की बेटी ने अपनी पिता के कर्ज का बोझ कम करने के लिए सांसों का साथ छोड़ दिया। मजबूर बाप को उसके ब्याह की फिक्र थी और अब वो कर्जदार किसान बेटी के कफन के इंतजाम में लगा है। अपनी जान देते हुए उसने अपने पिता को चिट्ठी में लिखा है, 'जान दे रही हूं, ताकि पिता का बोझ कम हो।'


21 साल की शीतल घर के आंगन की लाड़ली थी। मां-बाप उसके ब्याह को फिक्रमंद थे। जमीन कभी सूखे तो कभी कोहरे की भेंट चढ़ गई थी। एक दिन दिल को हल्का करने के लिए शीतल के पिता ने उसकी मां से दिल का दर्द साझा किया था। कहा था कि साहूकारों का कर्ज बढ़ता जा रहा है। सिर पर शीलती की शादी की फिक्र है, कैसे होगा। शीतल ने मां-बाप की बात सुन ली। पिता की मजबूरी ने शीतल का दिल ऐसा तोड़ा कि उसने कुएं में कूदकर जान दे दी।


शीतल का आखिरी खत पढ़कर आपका दिल भी रो उठेगा...


''मैं शीतल वायाळ चिट्ठी लिख रहीं हूं , मेरे पिता मराठा कुनबी समाज यानी किसान है। पिछले पांच सालों से पड़े अकाल के चलते हमारे परिवार की हालत नाजुक बन चुकी है। कभी अकाल तो कभी कोहरे की वजह से खेती में बड़ा नुकसान हुआ है। कुछ साल पहले ही मेरी दो बहनों की शादी पापा ने साहूकार से कर्ज लेकर की है। सिर पर कर्जा आमदनी शून्य होने की वजह से हमारे परिवार में आर्थिक संकट आ चुका है। हमारे हालत गरीबी से भी बदतर बन चुके है। कोई भी बैंक या साहूकार भी अब कर्जा देने को तैयार नहीं, इसीलिए पिछले दो सालों से मेरी शादी नहीं हो रही थी। मराठा समाज की रूढ़ि परंपरा है कि शादी में दहेज़ के नाम पर बड़ी रकम की मांग होती है। समाज में चल रही दहेज़ की परंपरा और किसान पिता की गरीबी कम हो, इसीलिए मैं अपनी मर्जी से जान दे रही हूं।''