फराज ने कायम की मिसाल, तारिषी के लिए चुन ली मौत

सैय्यदा अफीफा, नई दिल्ली (4 जुलाई): कहते हैं कि दोस्त वही होता है जो मुश्किल घड़ी में आपके साथ खड़ा रहे, ना कि मुश्किल घड़ी में मुंह मोड़कर दोस्त को मुश्किल में छोड़कर निकल जाए। दोस्ती क्या होती है इसकी मिसाल कायम की है ढाका आतंकी हमले के शिकार तारिषी के दोस्ता फराज़ ने। फराज़ की जान बच सकती थी अगर वो तारिषी का साथ छोड़ देता, लेकिन फराज़ ने ऐसा नहीं किया।

ढाका में इंसानियत के दुश्मन और आतंकी जब लोगों को गिन-गिनकर उनका धर्म और उनका नाम पूछकर ज़िंदगी और मौत दे रहे थे उस वक्त फराज़ भी वहां मौजूद था। फराज़ अच्छी तरह से जानता था कि अगर वो कुरान की आयतें सुना देगा तो उसकी जान बच जाएगी, लेकिन उसके सामने उसकी दोस्त की ज़िंदगी मुश्किल में थी और उसने अपनी जान बचाने से पहले तारिषी की जान बचाने की हर संभव कोशिश की। अपनी जान से ज़्यादा उसने अपनी दोस्त को बचाने की अहमियत दी और दोस्ती के नाम पर कुर्बान हो गया। ना मज़हब, ना जात और ना ही क्षेत्र की परवाह फराज़ के लिए सिर्फ इंसानियत ही सबसे ऊपर थी।

चश्मदीद के मुताबिक, 20 साल के फराज ने अपनी दोस्त तारिषी और अंबिता के लिए जिंदगी दांव पर लगा दी। आतंकी लोगों की पहचान पूछकर मार रहे थे। बांग्लादेशी होने की वजह से हमलावरों ने फराज को रेस्टोरेंट से जाने को कहा, लेकिन उसने अपने दोनों दोस्तों को छोड़कर जाने से मना कर दिया। 19 साल की तारिषि भारतीय मूल की थी जबकि 19 साल की अंबिता बांग्लादेशी थी, लेकिन वो अमेरिका में पढ़ाई कर रही थी। दोनों उस रात वेस्टर्न आउटफिट पहने थीं। तारिषी, अंबिता और फराज़ इफ्तार के बाद कैफे गए थे। ढाका के शैतानों ने फराज़ से दोनों की पहचान पूछी। फराज़ ने उन्हें बताया कि उनकी दोस्त तारिषी भारतीय मूल की है जबकि अंबिता बांगलादेशी है। जैसे ही दोनों की पहचान का पता चला, आतंकियों ने दोनों को मारने की तैयारी कर ली और फराज़ को छोड़ने की, लेकिन फराज़ ने वहां से हिलने से इनकार कर दिया।

फराज़ और आतंकियों के बीच कुछ बहस भी हुई। कई बार वहां से जाने के लिए कहने के बावजूद फराज़ वहां से नहीं हटा, बाद में आतंकियों ने उसे भी मार दिया। इसे कहते हैं इंसानियत जो जान से भी ज़्यादा कीमती थी। हालांकि फराज़ की इस कुर्बानी का असर आतंकियों पर ज़रा भी नहीं पड़ा। शैतानों ने तीनों दोस्तों को एक साथ मौत की नींद सुला दिया।

तारिषि छुट्टियां मनाने बांग्लादेश गई थीं। हाल ही में कैलिफोर्निया की बर्कले यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया था। तारिषि के पिता का कपड़े का बिजनेस है, वो ढाका में करीब 10 साल से रह रहे हैं। उनका घर इस रेस्टोरेंट से बिल्कुल करीब है। अक्सर तारिषी और दोस्त फराज़ रेस्ट्रां में जाया करता थे, लेकिन शुक्रवार की रात उन दोनों की ज़िंदगी की आखिरी रात साबित हो गई। ढाका में आतंकी हमले के दौरान मारी गई तारिषी जैन ने अपने परिवार को फोन भी किया था। उसने कैफे के बाथरूम में खुद को छुपाया और वहां से अपने पापा को फोन किया। उसने कहा, 'आतंकी रेस्टोरेंट में घुस गए हैं। मुझे डर लगा रहा है पता नहीं कि मैं जिंदा बाहर आ पाऊंगी या नहीं। वो सब लोगों को मार रहे हैं।' इसके बाद फोन कट गया।

आज सुबह तारिषी जैन का शव दिल्ली पहुंचा। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और पीयूष गोयल ने एयरपोर्ट पहुंचकर तारिषी को श्रद्धांजलि और उनके परिवार को सांत्वना दी। तारिषी के अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली से सटे गुड़गांव को चुना गया। तारिषी जैन की मौत के बाद ना केवल उनके परिवार वाले सदमे में हैं बल्कि इसके चलते उनके होम टाउन में भी मायूसी छाई हुई है। रविवार को यूपी के फिरोजाबाद में तारिषी को श्रद्धांजलि देने के लिए कैंडल मार्च निकाला गया।