पत्नी के अवैध संबंधों की इस सच्ची कहानी पर आधारित है अक्षय की फिल्म 'रूस्तम'

नई दिल्ली (6 जुलाई): हाल ही में अक्षय कुमार की फिल्म रुस्तम का ट्रेलर रिलीज हुआ, लेकिन बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि यह फिल्म एक नौसेना अधिकारी की जिंदगी पर आधारित है। फिल्म की कहानी एक ऐसी सच्ची घटना पर आधारित है, जिसने सन 1959 में पूरे देश को हिलाकर रख दिया था।

नौसेना के कमांडर कवास मानेकशॉ नानावती नेवी के होनहार अधिकारियों में से थे। वे ब्रिटेन के डॉर्टमाउथ स्थित रॉयल नेवी कॉलेज के छात्र और आईएनएस मैसूर के सेकंड इन कमांड थे। नानावती दूसरे विश्वयुद्घ के दरमियान कई मोर्चों पर लड़ चुके थे। ‌ब्रिटिश हुक्मरानों ने उन्हें वीरता पुरस्कारों से भी नवाजा था।

इस कहानी पर आधारित है फिल्म: नौसेना के कमांडर कवास मानेकशॉ नानावती की पत्नी सिल्विया ने उन्हें 27 अप्रैल 1959 को एक ऐसी सच्‍चाई बताई, जिसने उनकी दुनिया में तूफान ला दिया। ‌सिल्विया ने अपने पति नानावती को बताया कि वह किसी और से प्यार करती है। और यह कोई दूसरा नहीं, बल्‍कि उन्हीं का पारिवारिक मित्र प्रेम आहूजा था।

इसके बाद नानावती मुंबई के कोलाबा के कफ परेड के अपने घर से कार में पत्‍नी सिल्‍विया और तीन बच्चों के साथ निकले। वह बीवी और बच्‍चों को मेट्रो सिनेमा पर छोड़कर बांबे हॉर्बर की ओर गए, उनकी बोट उन‌ दिनों वहीं खड़ी थी। उन्होंने कैप्टन से कहा कि वे अहमदनगर जा रहे हैं, उन्हें रिवॉल्वर और छह गोलियों की जरूरत है। उन्होंने बंदूक एक पैकेट में रखी और अपनी कार से यूनिवर्सल मोटर्स की ओर बढ़ गए। ये पेडर रोड पर गाड़ियों का शोरूम था, जिसका मालिक प्रेम आहूजा था।

आहूजा उस दोपहर अपने शोरूम पर नहीं था, वह लंच करने घर गया था। शोरूम पर तफ्तीश के बाद नानावती अपनी कार से मालाबार हिल की ओर मुड़ गई थी, मंजिल थी नेपियर सीरोड की सितलवाड़ लेन का एक फ्लैट। इसी फ्लैट में प्रेम आहूजा रहता था। आहूजा का परिवार करांची से मुंबई आया था। वो अपनी बहन मेमी की साथ रहता था।

आहूजा नहाकर बाथरूम से बाहर आया था। उसकी नौकरानी नानावती को तीसरे फ्लोर पर बने उस अपार्टमेंट तक लाई। नानावती सीधे आहूजा के बेडरूम में गए और दरवाजा अंदर से बंद कर दिया। चंद मिनटों तक सन्नाटा रहा और उसके बाद तीन गोलियों की आवाज सुनाई दी। आहूजा लहूलुहान जमीन पर गिरा तो उसके बदन पर बस एक तौलिया था। नानावती अपार्टमेंट से बाहर निकल आए। वहां अब केवल मेमी की चीखें ‌‌थीं और आहूजा की लाश।

नानावती अपने कार से मालाबार हिल की ओर बढ़ गए। राजभवन के गेट पर रुककर उन्होंने एक कांस्टेबल से नजदीकी पुलिस स्टेशन का पता पूछा। वे उस स्टेशन में गए और आत्मसमर्पण कर दिया। गामदेवी पुलिस स्टेशन के सभी पुलिस कर्मचारी कुछ क्षणों के ‌लिए सकते में आ गए। मुंबई की चकाचौंध के चर्चित चेहरे प्रेम आहूजा की हत्या का ये एक ऐसा मामला था, जिससे न शहर का आम-ओ-खास दहल गया, बल्‍कि न्याय प्रणाली भी हिल उठी।

नानावती पर चले मुकदमा की दुनिया भर में चर्चा हुई। मामले में शुरुआती किरदार तीन ही थे, लेकिन बाद में राम जेठमलानी और विजय लक्ष्मी पंडित जैसी श‌ख्सियतों का नाम केस से जुड़ा। उस जमाने के मशहूर पत्रकार और ब्लिट्ज के संपादक वीके करांजिया ने भी केस में अहम भूमिका निभाई। ब्लिट्ज ने उस दौर में जैसी रिपोर्टिंग की, उसे मुल्क का पहला मीडिया ट्रायल माना गया। सेशन कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक तकरीबन ढाई साल तक केस चला और करांजिया ने नानावती को बरी करने के लिए ‌अपने अखबार का भरपूर इस्तेमाल किया।

करांजिया पारसी थे और नानावती भी। इसलिए करांजिया की सहानुभूति स्वाभविक तौर नानावती की ओर रही, जबकि जेठमलानी ने प्रेम आहूजा की ओर से मुकदमा लड़ा। दोनों ही सिंधी थे। ये एक ऐसा केस था, जिसकी चर्चा बड़ापाव की दुकानों पर भी हुई और पांच सितारा पार्टियों में भी। ये केस पारसी और सिंधी समुदाय के बीच मनमुटाव का कारण भी बना।

1961 की सर्दियों में सुप्रीम कोर्ट ने नानावती को उम्रकैद की सजा सुनाई, हालांकि कुछ दिनों बाद सरकार ने उन्हें माफी दे दी और वे जेल से बाहर आ गए। नानावती पर धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था, हालांकि जूरी ने उन्हें 302 के तहज दोषी नहीं माना। जूरी ने अपने फैसले में उन्हें 8-1 के मत से निर्दोष करार दिया।