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गुजरात फर्जी एनकाउंटर मामला: रिपोर्ट में कहा गया 18 मामलों में 3 मामले फर्जी

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार की अपील ख़ारिज करते हुए साफ़ कर दिया है कि गुजरात के कथित फेक एनकाउंटर से संबधित सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एचएस बेदी की जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक होने से नहीं रोका जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस HS बेदी की अगुवाई में बने एसटीएफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल 18 एनकाउंटर के मामलों में से 3 मामले फर्जी एनकाउंटर के पाए गए हैं। 221 पेज की रिपोर्ट में कहा गया है कि 18 में से 15 एनकाउंटर सही थे और इसमें किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई की जरूरत नहीं।

न्यूज24 ब्यूरो, नई दिल्ली (12 जनवरी):  सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार की अपील ख़ारिज करते हुए साफ़ कर दिया है कि गुजरात के कथित फेक एनकाउंटर से संबधित सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एचएस बेदी की जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक होने से नहीं रोका जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस HS बेदी की अगुवाई में बने एसटीएफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल 18 एनकाउंटर के मामलों में से 3 मामले फर्जी एनकाउंटर के पाए गए हैं।  221 पेज की रिपोर्ट में कहा गया है कि 18 में से 15 एनकाउंटर सही थे और इसमें किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई की जरूरत नहीं।

3 एनकाउंटर्स के बारे में कहा गया है कि ये फर्जी थे और इनमें शामिल 9 पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में किसी नेता या मंत्री के खिलाफ कोई बात नहीं कही गयी है। कमेटी ने तीन एनकाउंटर को फर्जी पाया है जिसमे समीर खान का एनकाउंटर,  कासिम जाफर और हाजी इस्माइल का एनकाउंटर शामिल है।

आपको बता दें की पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार के विरोध को दरकिनार करते हुए रिपोर्ट को याचिकाकर्ता बी जी वर्गीज़ और  जावेद अख्तर को सौंपने को कहा था।

क्या है मामला ?

आरोप है कि साल 2002 से 2006 के बीच एक ख़ास समुदाय से संबंध रखने वाले 22 से 37 साल की उम्र के नौजवानों को फर्जी पुलिस मुठभेड़ों मार दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि इन सभी पर आरोप था कि इन्होने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रची थी। साल 2007 में वरिष्ठ पत्रकार वी जी वर्गीस और गीतकार जावेद अख्तर ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका के जरिये इन मामलों की सीबीआई या एसआईटी के जरिये जांच की याचिका दायर की थी। पहले इस मामले की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश एमबी शाह के नेतृत्व में एक जांच कमेटी का गठन किया था हालांकि शाह के पीछे हटने के बाद ये जिम्मा पूर्व न्यायाधीश एचएस बेदी को दे दिया गया।

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