प्रकृति को चुनौती देता विज्ञान : मां के गर्भ से बाहर भी मानव भ्रूण का विकास मुमकिन!

नई दिल्ली (6मई): विज्ञान प्रकृति के नियमों को एक बड़ी चुनौती देने के नजदीक पहुंच गया है। । बुधवार को वैज्ञानिकों की ओर से रिपोर्ट किया गया कि उन्होंने लैब में करीब दो हफ्ते तक मानव भ्रूण को विकसित करने में सफलता पा ली है। इस अभूतपूर्व कदम से ना सिर्फ प्रजनन, स्टेम सेल थिरेपीज़ में सहायता मिलेगी बल्कि ये मानव के जैव विकास को भी समझने में आसानी होगी। 

किसी एकल (इन्डिविजुअल) की रचना की दिशा में ये शोध अहम कदम साबित हो सकता है। इसके अलावा इससे गर्भावस्था में शीघ्र मिसकैरिएज जैसी जटिलताओं के निदान की ओर भी बढ़ा जा सकेगा। साथ ही ये शोध इस बात से भी पर्दा उठा सकेगा कि इन विट्रो फर्टिलेजेशन की कामयाबी दर इतनी कम क्यों होती है।  शोध ने ये भी दिखाया है कि नवसर्जित मानव भ्रूण को मां के गर्भ से बाहर कुछ दिनों से आगे भी विकसित किया जा सकता है। ये वो चीज़ है जिसे पहले नामुमिकन समझा जाता था।

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में हुए एक ताजा शोध से इन विट्रो फर्टिलिटी तकनीक में क्रांति आने वाली है। अभी तक इन विट्रो फर्टिलिटी की कामयाबी महज़ 35 फीसदी है। अब इसके बढ़ जाने की संभावनायें बन गयी हैं। 'वाल स्ट्रीट जनरल' में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक पहली बार भ्रूण विज्ञानियों ने 13 दिन तक किसी भ्रूण को जीवित रख कर उसमें होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया है। अभी तक अधिकतम सात दिनों तक ही किसी भ्रूण को जीवित रख कर शोध किये गये थे। मां के गर्भ से बाहर लेकिन गर्भ जैसा वातावरण तैयार करके वैज्ञानिकों ने भ्रूण को विकसित किया।

इस शोध की पहली उपलब्धि यह रही कि वैज्ञानिकों को यह पता चल गया कि आदमी और पशुओं में के भ्रूण विकास अलग-अलग तरह से होते हैं। दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि यह कि वैज्ञानिकों ने यह भी जाना कि भ्रूण में किस तरह कोशिकाओं और अंगों का विकास होता है। इस शोध को करने वाली मागदालेना ज़ेरनिका गोएत्ज़ ने कहा कि भ्रूण का विकास अभी तक ब्लैक बॉक्स की तरह था। आदमी और पशु दोनों के भ्रूण मां के पेट से बाहर ठीक उसी तरह विकसित हो रहे थे, जैसे वो मां के पेट में विकसित होते हैं। गोएत्ज़ कहती हैं कि यह एक आश्चर्य था कि मां के जैविक संकेतों के बिना ही दोनों भ्रूण में शरीर के अंग बनने की प्रारंभिक अवस्था शुरु हो गयी थी।

अभी तक यह अवधारणा थी कि पिता के स्पर्म और मां के अण्डजों को मिला कर तैयार किये जाने वाले भ्रूण के विकास के लिए मां का गर्भ अनिवार्य है। लेकिन नये शोध से यह साबित होता है कि भ्रूण मां के गर्भ के बाहर भी शरीर का आकार ले सकता है। इस नयी रिसर्च के बाद ये माना जा रहा है कि अगर भ्रूण शोध के लिए निर्धारित अधिकतम 14 दिन की सीमा के नियम में संशोधन किया जा सकता है। एम्ब्रोयनिक रिसर्च से जुड़े सूत्रों का कहना कि यह शोध आग बढ़ता है तो माता-पिता अपनी प्राकृतिक कोख की बजाए आर्टिफीशियल यूटरस से बच्चे का जन्म दे सकेंगे, लेकिन यह अभी सिर्फ मानसिक विचार के स्तर तक या एक कल्पना ही है। हां, इतना जरूर कहा जा सकता है कि इस नये रिसर्च से आईवीएफ की सफलता में बढ़ोत्तरी और माता-पिता के जैनेटिक डिसऑर्डर्स को भ्रूण अवस्था में उपचार किया जा सकेगा।