वर्ष 2300 तक धरती बन जाएगी आग का गोला...इनसानों का रहना हो जाएगा नामुमकिन!

नई दिल्ली (24 मई) :  बस कुछ साल और...धरती बन जाएगी आग़ का गोला...और यहां इनसानों का जीवित रहना हो जाएगा नामुमकिन...'नेचर क्लाइमेट चेंज' में प्रकाशित लेख में कनाडियाई शोधकर्ताओं ने आंकड़ों के ज़रिए ऐसे कई चौंकाने वाले तथ्यों का खुलासा किया है। इन शोधकर्ताओं का मानना है कि जीवाश्म ईंधन के जलने का धरती पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। इनके मुताबिक ये सब वर्ष 2300 तक संभव हो सकता है। यानि बस 184 साल ही और रह गए हैं।  

लेख में कहा गया है कि सारे जीवाश्म ईंधन के जलने से हमारी धरती इतनी गर्म हो जाएगी कि वैश्विक तापमान 8 डिग्री तक बढ़ जाएगा। इससे 5 ट्रिलियन टन (5 लाख करोड़ टन) कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन होगा। इससे धरती पर क्या असर पड़ेगा, खुद ही समझा जा सकता है।

इंटरनेशनल बिज़नेस टाइम्स (ऑस्ट्रेलिया) की रिपोर्ट के मुताबिक स्टडी में आईपीसीसी (इंटरगर्वमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज) के एक्सटेंडेड मॉडल का इस्तेमाल किया गया है। इसमें पाया गया है कि जीवाश्म ईंधन के जलने से पहले जैसे सोचा गया था, उससे कहीं ज़्यादा असर धरती पर पड़ने वाला है। वर्ष 2300 तक आर्कटिक क्षेत्र का तापमान ही 19.5 डिग्री तक बढ़ जाएगा। वहीं वैश्विक तापमान की बात की जाए तो तापमान पूर्व औद्योगिक काल की तुलना में 6.4 डिग्री से 9.5 डिग्री के बीच बढ़ जाएगा। औसतन ये 8.2 डिग्री बैठता है।

मुख्य शोधकर्ता कैटारज़िना तोकारस्का ने कहा कि टेम्परेट क्षेत्रों जैसे कि मेडेटेरेनियन, ऑस्ट्रेलिया और अमेज़न में बारिश पहले की तुलना में आधी रह जाएगी। दूसरी तरफ ट्रॉपिकल क्षेत्रों में ग्लोबल वॉर्मिंग से बारिश चार गुणा बढ़ जाएगी।

टोकारस्का ने इंगित किया कि पहले के क्लाइमेट मॉडल्स ने ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरे को हल्के में लिया था। साथ ही वर्ष 3000 से पहले कोई गंभीर खतरा नहीं माना था। 

शोध में कहा गया है कि इस तरह के क्लाइमेट बदलाव इकोसिस्टम, इनसान के स्वास्थ्य, कृषि, अर्थव्यवस्था और अन्य सेक्टर्स पर अत्यधिक असर डालेंगे।

अगर इनसान की वजह से क्लाइमेट बदलाव से वैश्विक तापमान 8 डिग्री तक बढ़ता है तो धरती का बहुत बड़ा हिस्सा इतना गर्म हो जाएगा कि यहां इनसानों का जीना मुश्किल हो जाएगा। सारे तटीय और नीचे तल वाले इलाके समुद्र के अंदर चले जाएंगे। धरती इतनी गर्म हो जाएगी जितनी कि 6.5 करोड़ साल पहले थी, जब यहां डॉयनासोर्स का वर्चस्व था।  

शोध के अनुसार अगर क्लाइमेट को दो डिग्री तक स्थिर करना है तो इनसानों को जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल पर तेजी से और निर्णायक ढंग से अंकुश लगाना होगा। अल नीनो की वजह से ऑस्ट्रेलिया के ग्रेट बैरियर रीफ का 100 प्रतिशत ब्लीच हो जाने का ख़तरा हो गया है। अर्थव्यवस्थाओं को अपना रास्ता बदलना होगा। ये बेहद चिंता का विषय है कि जीवाश्व ईंधन का दोहन बड़े पैमाने पर अब भी जारी है।