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लोकतंत्र की रक्षा के लिए लोकतंत्र की हत्या

इमर्जेंसी 'इंडिया' को नहीं बल्कि 'इंदिरा' को बचाने के लिए थी. इंदिरा गांधी आपातकाल के हथियार से लोकतांत्रिक राजव्यवस्था को तानाशाही से चलाना चाहती थीं - मानक गुप्ता

मानक गुप्ता, न्यूज 24, दिल्ली (25 जून): "आधी रात को जब पूरी दुनिया सो रही होगी, तब भारत ज़िंदगी और आज़ादी के साथ जगेगा..." (जवाहरलाल नेहरू का स्वतंत्रता दिवस पर दिया गया भाषण) मध्यरात्रि में गुलामी की बेड़ियां और सारे बंधन तोड़कर भारत आज़ाद हो गया, भारत को आज़ादी मिली और उसी के साथ-साथ सभी भारतवासियों को स्वतंत्रता के साथ जीने, बोलने और विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार भी मिल गया। संविधान हमारे देश को चलाने का आदर्श बन गया और जनतंत्र हमारी नींव। लेकिन वही इतिहास भाग्य की भयानक कहानी बन गई। एक और आधी रात ने जनतंत्र और आज़ादी के प्रति हमारे बढ़ते कदमों को रोक लिया.25 जून 1975 की मध्यरात्रि में राष्ट्रपति फकरूद्दीन अली अहमद ने इंदिरा गांधी के कहने पर देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। 26 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने देश को संबोधित करते हुए कहा कि "राष्ट्रपति ने आपातकाल लागू कर दिया है। घबराने की कोई बात नहीं है। देश और महिलाओं की प्रगति के लिए मैंने जो कदम उठाए थे उसके खिलाफ रचे जा रहे षड्यंत्र का जवाब देने के लिए ये आपातकाल ज़रूरी था। देश को तोड़ने वाली शक्तियां और सांप्रदायिक ताकतें भारत की एकता और अखंडता के लिए बहुत बड़ा खतरा बन गई थी।"आपातकाल इंडिया को नहीं बल्कि इंदिरा को बचाने के लिए था. "देश को तोड़ने वाली ताकतें" इंडिया को नहीं बल्कि इंदिरा को डरा रही थी। 1967 और 1969 के बीच कांग्रेस पार्टी भारत के 8 राज्यों में सत्ता से बाहर हो चुकी थी। कांग्रेस को एक तरफ जहां लेफ्ट और क्षेत्रीय पार्टियों के साथ लड़ना था वहीं दूसरी तरफ जन संघ के साथ भी सीधा मुकाबला करना था। लगातार एकजुट और मजबूत होते विपक्ष का मुकाबला करने में इन्दिरा गांधी नाकाम हो रही थीं।

ऐसे हालात में इंदिरा गांधी पर एक और मुसीबत आ गई। वो मुसीबत थी इलाहाबाद हाईकोर्ट का 'राज नारायण वर्डिक्ट'। 12 जून 1975 के इस फैसले में कोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनाव में गलत तरीके इस्तेमाल करने का दोषी पाया और लोकसभा में उनके चुनाव को रद्द कर दिया। कोर्ट के इस फैसले से न सिर्फ उऩकी रायबरेली सीट जाती रही बल्कि उनके चुनाव लड़ने पर भी 6 साल का प्रतिबंध लगा दिया गया। 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने उनसे सांसदों को मिलने वाली सारी सुविधाएं वापस ले लीं और उनसे वोट देने के अधिकार भी छीन लिए गए। इसके अगले ही दिन इंदिरा गांधी ने  देश में राष्ट्रीय आपातकाल लगा दिया।जनतंत्र को बचाने के लिए जनतंत्र का कत्लइंदिरा गांधी ने आपातकाल को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। वो लोकतांत्रिक राजव्यवस्था को तानाशाही से चलाना चाहती थीं. इंदिरा गांधी ने अपनी दोस्त को बताया था कि आपातकाल का मकसद भारत में लोकतंत्रिक काम-काज वापस लाना था। इसके ठीक उलट 21 महीने के इस आपातकाल ने लोकतंत्र के सिद्धांतों को पूरी तरीके से खत्म कर दियाा। कांग्रेसियों को छोड़कर सभी लोगों को टारगेट किया गया। उन्हें जेल में बंद किया जा रहा था। खासतौर से ट्रेड यूनियन, स्टूडेंट एक्टिविस्ट, जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टीज़ के लोगों को चुन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा था और सलाखों के पीछे भेजा जा रहा था।आपातकाल ने स्वतंत्रता  को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया था। आपातकाल के ऐलान के साथ ही सभी जरूरी मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था। इनमें शामिल थे -1. अनुच्छेद 14 - कानून के आगे समानता.2. अनुच्छेद 21 - ज़िंदगी और आज़ादी की सुरक्षा3. अनुच्छेद 22 की कई धारा जो पुलिस हिरासत से बचाती हैंएक स्वस्थ जनतंत्र की पूरी व्यवस्था कोमा में चली गई थी। कई प्रकार के कठोर कानून, बेरहमी से मानव अधिकारों के हनन और व्यापक पैरा-मिलिट्री ऑपरेशन भारत को धीरे-धीरे एक पुलिस-स्टेट बना रहे थे। सरकार ने आम जनता के गले पर फंदा कसने के लिए कई तरह के निरंकुश कानून बनाए. आंतरिक सुरक्षा संरक्षण (मीसा) जैसे कठोर कानून के तहत हज़ारों लोगों को कैद कर लिया गया। 22 जुलाई 1975 को किए गए 38वें संवैधानिक संशोधन से आपातकाल के जूडिशियल रिव्यू पर रोक लगा दी गई। 39वें संशोधन के तहत प्रधानमंत्री के चुनाव को सुप्रीम कोर्ट के दायरे से ही बाहर कर दिया. प्रधानमंत्री का पद पूरी तरह संसद के अधिकार क्षेत्र में आ गया। राजनैतिक हित साधने के लिए न्यायपालिका की आज़ादी भी छीन ली गई थी। भले ही निचली अदालतों ने मीसा के तहत गिरफ्तार हुए लोगों का न्याय मांगने का अधिकार कायम रखा पर चौंकाने वाली बात थी कि सुप्रीम कोर्ट ने बगैर ट्रायल कैद को कानूनी तौर पर जायज़ ठहरा दिया। 42वें संशोधन ने संसद को इतना ताकतवर बना दिया था कि वो संविधान का संरक्षण भी कर सकती थी या फिर उसे नष्ट भी कर सकती थी।एक और संस्थान जो आपातकाल की वजह से बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ, वो था प्रेस। आपातकाल के 21 महीने के दौर में प्रेस की आवाज को बार बार बुरी तरह दबाया गया। सरकारी ताकतों ने पूरे मीडिया को अपने कंट्रोल में ले लिया था। संपादकों को आदेश था कि वो अपने न्यूज़ के विषय वस्तु और उसका इरादा दोनों के बारे में सरकार को पहले से जानकारी दें। न्यूज़ का स्वभाव और चरित्र दोनों सरकार में उच्च स्तर पर तय होता था। प्रधानमंत्री का प्रचार-प्रसार ही न्यूज़ का सबसे अहम विषय बन गया। प्रेस काउंसिल अप्रासंगिक बन चुका था। कुलदीप नैयर, बरून सेनगुप्ता, गौर किशोर घोष, के. आर सुंदर राजा और 250 अन्य पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया।हमेशा से क्रांति चाहती थीं इंदिरा इंदिरा चाहती थी कि उनके आसपास हमेशा हां बोलने वाले लोग मौजूद रहे। उनके सामने जनसेवक, न्यायपालिका और यहां तक कि कांग्रेस के नेता भी कमज़ोर पड़ गए थे। बी.एन टंडन 1969 से 1976 तक इंदिरा गांधी के पीएमओ में जॉइंट सेक्रेटरी के पद तैनात पर थे। उन्होंने अपनी किताब ‘PMO Diary-I- Prelude to Emergency’ में लिखा है की इंदिरा गांधी बाहर से बहुत ही सभ्य और शालीन थीं लेकिन उनमें नैतिक आदर्श बिल्कुल नहीं थे।जिन लोकतांत्रिक मूल्यों में पिता जवाहरलाल नेहरू ने भरोसा जताया था, इन्दिरा गांधी उनसे खुश नहीं थीं। साल 1963 में इंदिरा गांधी ने अपने दोस्त को लिखे एक खत में कहा था, "जनतंत्र न सिर्फ औसत दर्जे के लोग पैदा करता है बल्कि ये सबसे ज्यादा बोलने वालों को ताकत दे देता है फिर चाहे उनमें ज्ञान और समझदारी की कमी ही क्यों ना हो।" अपने प्रधानमंत्री बनने के तीन साल बाद इंदिरा गांधी ने कहा था कि वो चाहती थीं "काश भारत में स्वतंत्रता के समय फ्रांस और रूस के जैसी असली क्रांति आती।"संयोग है कि आज जब हम आपातकाल का फिर से मूल्यांकन कर रहे हैं तब एक रिसर्च जर्नल 'डेमोक्रेटाइजेशन' में छपी रिपोर्ट ने हमें ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हमारे आज के लोकतंत्र में भी कोई खामी है। भारत और अमेरिका ऐसे 24 देशों में गिने जा रहे हैं जहां लोकतंत्र का स्तर गिरता जा रहा है। 'डेमोक्रेटाइजेशन' की रीसर्च टीम का मानना है की दुनिया का एक तिहाई हिस्सा यानि करीब 2.6 अरब लोग धीरे धीरे एक तरह की तानाशाही की तरफ बढ़ रहे हैं। इस विश्लेषण का मानना है कि बीमारी ऐसे फैल रही है कि कई बार दिखती भी नहीं। पत्रकारों को धमकियां, उनकी हत्याएं, सिविल सोसायटी का कमजोर होना और शारीरिक और मौखिक हत्या (Lynching) से संकेत साफ हैं कि लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की जगह सिकुड़ रही है।40 साल पहले का आपातकाल आज एक बुरा सपना बन चुका है। आज के हिन्दुस्तान में जागरूक नागरिकों, सतर्क मीडिया और मजबूत न्यायपालिका के रहते न किसी कोई समझदार आवाज दबाई जा सकेगी और न ही लोकतंत्र को खत्म करना मंज़ूर किया जाएगा। मेरा मानना है कि भारत आपातकाल जैसा काला दौर फिर कभी नहीं देखेगा।(लेखक न्यूज 24 वरिष्ठ एंकर हैं)


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