60 रुपये हो जाएगी अरहर की दाल!

नई दिल्ली (23 अगस्त): महंगी दाल ने कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरुप तक लोगों को रुलाया। अरहर की दाल सोना हो गई, मिडिल क्लास तो छोड़िए रईसों की थाली और किचन के दाल गायब हो गई। लेकिन हिंदुस्तान के हर आदमी के लिए अच्छी ख़बर है।

अरहर की दाल की कीमतों में लगातर गिरावट आ रही है। दिल्ली हो या मुंबई दाल की कीमतें कम हो रही हैं। इससे पहले की हम आपको दाल की कीमतों का अर्थशास्त्र समझाएं पहले ये जान लीजिए कि आजा की तारीख में दाल किस रेट से मिल रही है।

एक महीने में दाल की कीमतें कितनी कम हुई जानने के लिए न्यूज़ 24 संवाददाता दिव्या अग्रवाल पहुंचीं दिल्ली की खरी-बावली मंडी ...

         अब                 पहले अरहर    90                 130 उड़द    115                140 मूंग      65                  90 चना      90                100

दिल्ली ही नहीं मुंबई में लोगों की आराम से सस्ती दाल मिल रही है। दो महीने पहले तक मुंबई में भी अरहर सोने की तरह महंगी हो चुकी थी। महाराष्ट्र सरकार तर्क दे रही है कि दाल की कीमतों में कमी जमाखोरों पर नकेल कसने की वजह से आयी है। वहीं, दाल के कारोबियों का मानना है कि अगर ऐसे ही दाल की कीमतों में गिरावट होती रही तो जल्द ही अरहर की दाल 60 रुपये किलो बाजार में बिकने लगेगी।

कारोबार जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि सरकार अपने बफर स्टॉक से अब लगातार दाल निकाल रही है। जिससे बाजार में दाल अधिक आ गयी है और लोगों को अभी और सस्ती दाल मिलेगी। जानकारों का मानना है कि जमाखोर के लिए भी अपनी दाल निकालना मजबूरी हो गयी है, क्योंकि पुरानी दाल के खराब होने का चांस ज्यादा है। ऐसे में बाजार में सरकारी बफर स्टॉक और जमाखोरों की दाल ने मिलकर हिंदुस्तान के दाल प्रेमियों के चेहरे पर चमक ला दी है।

हिंदुस्तान के हर हिस्से में दाल खाई जाती है। उत्तर हो या दक्षिण, पूरब हो या पश्चिम बिना दाल के खाना मुकम्मल नहीं होता। लेकिन इस बार बेहतर मॉनसून और दाल की उम्मीद से ज्यादा बुआई से सरकार और आम आदमी दोनों ही सस्ती दाल का सपना संजोए हुए हैं। हिंदुस्तान में दालों की मांग 3.30 करोड़ टन तक पहुंच चुकी है। इसमें से अरहर दाल की मांग 1 करोड़ 80 लाख टन है।

हिंदुस्तान के किसान करीब एक करोड़ टन अरहर ही उगा पाते हैं। देश के लोगों को दाल खिलाने के लिए

- 2015-16 में 57 लाख टन - 2014-15 में 45.80 लाख टन - 2013-14 में 30.4 लाख टन - 2012-13 में 40.2 लाख टन विदेशों से मंगानी पड़ी।

अगर अरहर को ही लीजिए को फसल तैयार होने में करीब 6 महीने लगते हैं। अरहर की खेती का मतलब कुछ और नहीं उगाया जा सकेगा। इस बार किसानों ने ज्यादा मुनाफे की उम्मीद में अरहर की खेती करने का फैसला किया, लेकिन अब कीमतें कम होने लगी हैं।

एक बड़ा सच ये भी है कि दाल की प्रति हेक्टेयर उपज में दुनिया में हम बहुत पीछे हैं...

- भारत में प्रति हेक्टेयर 700 किलो दाल का उत्पादन होता है - फ्रांस में प्रति हेक्टेयर 4219 किलो दाल का उत्पादन होता है - कनाडा में प्रति हेक्टेयर 1936 किलो दाल का उत्पादन होता है - चीन में प्रति हेक्टेयर 1596 किलो दाल का उत्पादन होता है

दाल की बढ़ती कीमतों को देखते हुए किसानों ने अरहर की खेती इस बार ज्यादा की है। मोजाम्बिक जैसे अफीक्री देशों से हिंदुस्तान में ज्यादा दाल आने के लिए करार हो चुका है। ऐसे में देश के आम लोगों को महंगी दाल से तो आजादी मिल जाएगी, लेकिन दाल की सस्ती कीमतों से अगर किसान बिदक गए तो फिर मोंजाबिक, म्यामार, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों की दाल से ही काम चलाना पड़ेगा?