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श्रीहरिकोटा से DRDO के सैटेलाइट का प्रक्षेपण आज, छोड़े जाएंगे 2 उपग्रह

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के सैटेलाइट के प्रक्षेपण के लिए 16 घंटे की उल्टी गिनती (काउंटडाउन) शुरू हो गई है। ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी)-सी 44 रॉकेट से दो सैटेलाइट गुरुवार की रात छोड़े जाएंगे। इनमें डीआरडीओ का इमेजिंग सैटेलाइट माइक्रोसैट आर और छात्रों का सैटेलाइट कलामसैट शामिल है।भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधन संगठन (इसरो) के अधिकारियों ने यह जानकारी दी।

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (24 जनवरी): रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के सैटेलाइट के प्रक्षेपण के लिए 16 घंटे की उल्टी गिनती (काउंटडाउन) शुरू हो गई है। ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी)-सी 44 रॉकेट से दो सैटेलाइट गुरुवार की रात छोड़े जाएंगे। इनमें डीआरडीओ का इमेजिंग सैटेलाइट माइक्रोसैट आर और छात्रों का सैटेलाइट कलामसैट शामिल है।भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधन संगठन (इसरो) के अधिकारियों ने यह जानकारी दी।

अधिकारियों ने बताया कि श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से बुधवार शाम सात बजकर 37 मिनट पर काउंटडाउन शुरू हुआ। प्रक्षेपण का समय गुरुवार की रात 11 बजकर 37 मिनट तय किया गया है। अधिकारी के मुताबिक पीएसएलवी के एक नए प्रकार के रॉकेट के जरिए 700 किलोग्राम के दोनों उपग्रहों को छोड़ा जाएगा। इसरो के चेयरमैन के सिवान ने पहले बताया था कि वजन को कम करने और पिंड के आकार को बढ़ाने के लिए एल्यूमीनियम के टैंक का इस्तेमाल किया जा रहा है।

पीएसएलवी-सी44 उड़ान भरने के लगभग 14 मिनट बाद इमेजिंग सैटेलाइट माइक्रोसैट आर को यह 277 किलोमीटर की ऊंचाई पर अलग कर देगा। अलग होने के बाद यह लगभग 103वें मिनट में 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर पहुंचकर काम करना शुरू कर देगा। कलामसैट सैटेलाइट रॉकेट के चौथे चरण को कक्षीय प्लेटफॉर्म के रूप में इस्तेमाल करेगा। रॉकेट अपने चौथे चरण में कलामसैट को अत्यधिक ऊंचाई वाली कक्षा में स्थापित कर देगा, जहां से वह परीक्षण कार्यों को अंजाम देगा।

कलामसैट एक पेलोड है, जिसे छात्रों और स्थानीय स्पेस किड्स इंडिया ने मिलकर विकसित किया है। पीएसएलएवी में ठोस और तरल ईंधन से चलनेवाले चार स्तरीय रॉकेट इंजिन लगा है। इसे पीएसएलवी-डीएल नाम दिया गया है। पीएसएलवी-डीएल के नए प्रकार के रॉकेट पीएसएलवी-सी44 का यह पहला अभियान है। सूत्रों के मुताबिक 130 किलोग्राम वजनी माइक्रोसैट-R इमेजिंग सैटेलाइट का इस्तेमाल सैन्य जरूरतों के लिए होगा, इस उपग्रह  DRDO की कुछ चुनिंदा प्रयोगशालाओं में बनाया गया है। इस उपग्रह को पृथ्वी से 274 किलोमीटर दूर पोलर ऑर्बिट में स्थापित किया जाएगा, आम तौर पर प्रक्षेपित किये जाने वाले अर्थ ऑब्सेरवेशन उपग्रहों को पृथ्वी से 400-700 KM दूर कक्षा में स्थापित किया जाता है।

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