VVPAT से निकलने वाली 30 प्रतिशत पर्चियों की गणना से खत्म होगा EVM पर शक: राजीव शुक्ला





न्यूज24 ब्यूरो, नई दिल्ली (21 जनवरी):  आगामी लोकसभा चुनाव से पहले देश में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर बहस छिड़ी हुई है। इस पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राजीव शुक्ला ने चुनाव आयोग को सुझाव देते हुए कहा कि, 30 प्रतिशत पर्चियों की गणना करने की इजाजत दी जानी चाहिए,इससे ईवीएम पर शक खत्म होगा। राजीव शुक्ला ने कहा कि, "मैं इस बहस में पड़ना ही नहीं चाहता हूँ कि ईवीएम सही है या गलत। असली बहस तो इस मुद्दे पर होनी चाहिए कि यदि भारतीय राजनीति के एक बहुत बड़े तबके को इन मशीनों को लेकर शक है तो इस शक के निदान के लिए चुनाव आयोग क्या कर रहा है। शक का निराकरण करना चुनाव आयोग का फर्ज बनता है। मैं चुनाव आयोग की इस दलील को समझ सकता हूँ कि इतने बड़े देश में अचानक मशीनों से बैलेट पेपर पर जाना सम्भव नहीं है, लेकिन दूसरा भी तर्क उतना ही वजनदार है कि सारे विपक्षी दल वोटिंग मशीन पर विश्वास खो चुके हैं। उनका विश्वास वापस आये इसके लिए चुनाव आयोग क्या कर रहा है? हाल ही में कलकत्ता में हुई सारे विपक्षी दलों की महारैली में इन मशीनों के लेकर जोरदार चिन्ता व्यक्त की गयी। कई वक्ताओं ने तो इसे चोर मशीन बताया। ऐसे में चुनाव आयोग को इसका हल निकालना ही होगा। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के इतने ब़ड़े चुनाव को शक के आधार पर कराना देश के लिए उचित नहीं होगा। इसमें विश्व स्तर पर भारत की बदनामी होगी।"





राजीव शुक्ला ने कहा कि, "मेरे लिहाज से इसका एक बहुत आसान सा हल है जिस पर चुनाव आयोग को राजी होना पड़ेगा और उससे सारे विपक्षी दल सहित आम जनता भी सहमत हो जायेगी। सरकार को इस पर कोई आपत्ती नहीं होनी चाहिए। कुछ साल पहले जब इन मशीनों की शिकायत सुप्रीम कोर्ट के पास गयी थी तो कोर्ट ने इसके समाधान के लिए एक बीच का फार्मूला निकालते हुए यह आदेश दिया कि मशीन के साथ वीवीपैट की व्यवस्था की जाये अर्थात् वोट डालते ही एक पर्ची निकलेगी जिसमें किसी व्यक्ति ने क्या वोट दिया यह पता चल जायेगा। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश था कि इसे सारी मशीनों पर देश भर में लगाया जाये। पहले तो सरकार आना-काना करती रही कि इस पर 16 हजार करोड़ रुपये खर्च होगा और इतना पैसा कहां से आयेगा, लेकिन जब कोर्ट ने सख्ती से निर्देश दिया तो सरकार को वीवीपैट अर्थात् पर्ची निकलने का सिस्टम लगाना पड़ रहा है। अब इसमें एक विचित्र बात हो रही है कि पर्ची निकलने की व्यवस्था तो होगी लेकिन इनकी गणना पर रोक है।"





यूपीए सरकार में मंत्री रहे राजीव शुक्ला ने आगे कहा कि, "सवाल यह उठता है कि जब 16 हजार करोड़ रुपये खर्च कर यह व्यवस्था लग रही है तो उसका उपयोग क्यो नहीं किया जा रहा है। मतलब की उसकी गणना पर रोक क्यों लगी है? यदि किसी उम्मीदवार को शक है तो वह गणना की मांग अधिकारियों से कर सकता है और उसकी मांग पर अधिकारियों को गणना करके शक को दूर करना होगा। इस बात पर न तो सरकार सहमत हो रही है न ही चुनाव आयोग। पर्चियों की गणना हर चुनाव क्षेत्र में करने की विपक्ष मांग नहीं कर रहा है वह तो कह रहा है कि जहां शिकायत हो वहां करानी चाहिए। इस बात पर राजी न होना शक को और बढ़ा रहा है। बीच में कुछ विपक्षी नेताओं ने यह भी तर्क दिया कि यदि आप समूची पर्चियों की गणना नहीं करवा सकते हैं तो कम से कम 25 से 30 प्रतिशत पर्चियों की अनिवार्य गणना करने की इजाजत दीजिए। लेकिन इस पर चुनाव आयोग और सरकार सहमत नहीं हैं। मेरे लिहाज से 30 प्रतिशत पर्चियों की गणना करने की इजाजत दी जानी चाहिए। और सुप्रीम कोर्ट को भी इस बात के सख्त निर्देश चुनाव आयोग को देने चाहिए। मैं तो कहता हूँ कि लोकसभा चुनाव को पाक – साफ बनाने के लिए चुनाव आयोग को ही यह निर्णय कर देना चाहिए। इससे लोगों को शक भी दूर हो जायेगा और फिर कोई वोटिंग मशीन पर नुकताचीनी भी नहीं कर पायेगा वरना ये जनता के 16 हजार करोड़ रुपये बर्बाद करने का क्या फायदा है। कलकत्ता की रैली में विपक्षी दलों ने वोटिंग मशीन की लड़ाई लड़ने के लिए एक कमेटी भी बनायी है। इसके पहले कि ये लड़ाई शुरू हो चुनाव आयोग को अपने निर्णय की घोषणा कर देनी चाहिए।"





अन्य देशों का उदाहरण देते हुए राजीव शुक्ला ने कहा कि. "वैसे विश्व में जितने बड़े देश अमेरिका, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और कनाडा आदि हैं वे सभी बैलेट पेपर पर चुनाव करवा रहे हैं। इन देशों में जहां-जहां वोटिंग मशीन थी उसे भी हटा दिया गया है क्योंकि लोगों को उस पर शक था। अमेरिका में कुछ प्रांतों में मशीन से और ज्यादातर प्रांतों में बैलेट पेपर से चुनाव होता है। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि टेक्नालॉजी के युग में लोग कम्प्यूटर और सॉफ्टवेयर में जैसे चाहें वैसे गड़बड़ी कर लेते हैं। इजराईल सहित दुनिया के कई देशों में ऐसे विशेषज्ञ बैठे हैं जो किसी का भी कम्प्यूटर, सॉफ्टवेयर हैक करके मनचाहा काम कर लेते हैं। ऐसे उदाहरण रोज देखने को मिल रहे हैं। भारत में भी विपक्षी दलों को पूरी आशंका है कि इन विशेषज्ञों के माध्यम से सरकार मशीनों में कुछ गड़बड़ियां करा सकती हैं। कई चुनाव में कई उम्मीद्वारों ने यहां तक शिकायत की जिस बूथ पर उन्होंने खुद और उनके परिवार ने वोट दिया वो वोट मशीन में नहीं निकला और सारे वोट सत्तारूढ़ दल के निकले। यदि ऐसा है तो यह मामला और भी गंभीर है।"




"लोकतंत्र में हार जीत होती रहती है, कभी कोई पार्टी सत्ता में आती है तो कभी कोई। लेकिन चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को हमेशा निष्पक्ष रहना चाहिए। उन्हें चाहे भाजपा या कांग्रेस किसी की भी सरकार हो चुनाव निष्पक्ष कराना चाहिए ताकि जनता की असली भावना चुनाव के माध्यम से निकल कर आ सके। जब बूथ लूट लेने की शिकायतें बहुत आने लगीं थीं तो तत्कालानी मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने हर बूथ पर केन्द्रीय पुलिस फोर्स लगाकर ऐसी व्यवस्था की कि बूथ लूटने बन्द हो गये। इसके लिए हमेशा शेषन को याद किया जाता है। मेरा निवेदन मौजूदा चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा से यही है कि उनकी छवि एक सख्त और समस्या का हल निकालकर काम करने वाले अधिकारी की रही है। इसमें उन्होंने किसी की परवाह नहीं की और कई बार अपने विभाग के मंत्री की बात भी न सुनने के उदाहरण पेश किये। उनके पास अब एक ऐसा ही मौका आया है जब वह अपना नाम इतिहास में दर्ज करा सकते हैं। सुनील अरोड़ा यदि कम से कम 30 प्रतिशत वीवीपैट से निकलने वाली पर्चियों की गणना का आदेश देते हैं तो लोकतंत्र के इतने बड़े चुनाव को साफ-सुथरा कराने के लिए उन्हें हमेशा याद किया जायेगा।"