हार का ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ रहे हैं साथी दल!

नई दिल्ली (19 मई): कांग्रेस सिर्फ असम और केरल से आउट ही नहीं हुई है, बल्कि पश्चिम बंगाल में जिस लेफ्ट को चार दशक से उखाड़ने की बात कांग्रेस करती थी, उसी के साथ गठबंधन करके ममता को घेरने में भी नाकाम साबित हुई। तमिलनाडु में भी जयललिता के खिलाफ डीएमके के साथ गठबंधन करने के बावजूद कामयाबी नहीं मिली। असम में तो बीजेपी की सरकार बनाने का ठीकार ही कांग्रेस पर फोड़ा जा रहा है और ये बात दबी जुबां नीतीश कुमार भी कह रहे हैं।

बिहार में नीतीश-लालू-राहुल की तिकड़ी से मात खाने वाली बीजेपी असम में कांग्रेस की हार का जश्न ज्यादा मनाती नजर आई, ना कि अपनी जीत का। तभी तो पार्टी नेता ये कहने से नहीं चूके कि असम से एंट्री की है, अब उत्तर पूर्व के बाकी बचे राज्यों से भी कांग्रेस को उखाड़ देंगे। लोकसभा चुनावों में मिली हार के बाद से कांग्रेस पार्टी उपाध्यक्ष से लेकर प्रवक्ता तक एक ही रटारटाया बयान दे रहे हैं कि आत्ममंथन होगा। जनता के बीच दोबारा जाएंगे।

सवाल ये है कि कांग्रेस ने दो साल में आखिर कितना आत्ममंथन किया ? किया भी कि नहीं किया ? तभी तो असम की हार पर कांग्रेस को नसीहत दे रहे हैं नीतीश कुमार। कहते हैं कि असम में बिहार की तरह गठबंधन करने में कांग्रेस आनाकानी ना करती तो आज बीजेपी इतना ढोल नगाड़ा ना पीट पाती। असम में बीजेपी की जीत क्यों हुई, उसके अलग कारण हैं। लंबी मेहनत है। लेकिन कभी असम में खुद को किंगमेकर कह कर प्रचार कर रहे बदरुद्दीन अजमल खुद अपना चुनाव हार गए। लगे हाथ इसका ठीकरा उन्होंने कांग्रेस पर ही फोड़ दिया।

सिर्फ असम में बीजेपी की जीत का ठीकरा कांग्रेस पर नहीं फोड़ा जा रहा है। बल्कि पश्चिम बंगाल में लेफ्ट अपनी सियासी दुर्दशा के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार मान रही है। लेफ्ट के दर्जनों नेता कांग्रेस के साथ गठबंधन को अपनी भूल बता रहे हैं। वामपंथी कह रहे हैं कि हमने अपना वोट दिलाकर कांग्रेस की पोजिशन राइट कर दी, लेकिन कांग्रेस ने बंगाल में लेफ्ट को सियासत से लेफ्टराइट कर दिया।

कांग्रेस ने लेफ्ट का ऐसा हाल किया है कि पश्चिम बंगाल में अब तक सीधे मुकाबाल करने वाले वामपंथी तीसरे नंबर पर पहुंच गए हैं। जबकि कांग्रेस खुद विपक्ष की पार्टी बन बैठी है। इसीलिए अब पूछा जा रहा है कि क्या कांग्रेस से गठबंधन करने का खतरा क्या दूसरे क्षेत्रीय दल राज्यों में उठाएंगे ? 2014 से 2016 आ चुका है। कांग्रेस ने वापसी का प्रदर्शन अब तक नहीं किया। कांग्रेस के सामने इस वक्त चुनौती होगी कि वो अकेले आगे बढ़े या फिर गठबंधन की गाड़ी पर समझौते का हाथ पकड़कर चले। चुनौती होगी पार्टी के कार्यकर्ताओं में लगातार मिल रही हार से पैदा हुई हताशा की जगह जोश भरने की। चुनौती होगी राहुल गांधी के चेहरे पर भरोसा पैदा करने की। वक्त कम है। यूपी और पंजाब का चुनावी चक्रव्यूह इंतजार कर रहा है।